Mehfil-e-Ghazal

20 Sep

हलके फुल्के शब्दों से गहराई गूंध लेते हैं
बारिश के पानी में ही समंदर ढून्ढ लेते हैं !

अच्छी ग़ज़ल कहने वाले कैसे कर लेते हैं
नजारों से नजाकत की खुशबू सूंघ लेते हैं !

ये पैमाना-ऐ-ग़ज़ल बेहद नशीला होता है
चलो हम भी खुमुर के दो चार घूँट लेते हैं !

महफिले-ग़ज़ल में कुछ बात ऐसी होती है
इनसे उधार ज़िन्दगी की कुछ बूँद लेते हैं !

अच्छी ग़ज़ल सुन कर हम रोक नहीं पाते
मदहोश हो सुकूं से बस आँखें मूँद लेते हैं !

दिल के इतनी नज़दीक है ग़ज़ल ‘मिलन’
जिसे गा कर गला अपना हम रूंध लेते हैं !!

मिलन “मोनी”

Advertisements

Mat Rakha Karo

16 Sep

ग़मों से इतना राबता मत रखा करो
घर का दरवाज़ा खुला मत रखा करो !

आयना ही नही पहचान पाए तुमको
ख़ुद से इतना फ़ासला मत रखा करो !

सच है कहना तुम्हें दुनिया से अगर
तो इनायत का इरादा मत रखा करो !

जैसा खेला है वैसा ही नतीजा होगा
किसी और पे भरोसा मत रखा करो !

तेरे ऊपर मढ़ेगे इलज़ाम ज़माने वाले
तूफानों में ये कश्तियाँ मत रखा करो !

जो होता है रब की मरजी से होता है
अपने मन का नतीजा मत रखा करो !

क्या ग़ज़ब तुम करते हो ‘मिलन’
ज़मींन पर आसमांन मत रखा करो !!

मिलन “मोनी”

Tanhaa

10 Sep

बिना तेरे मुझे और जीना नहीं है
सिवा नज़रों के और पीना नहीं है !

बुझे प्यास कैसे दिल की पीने से
प्याला ग़मों से कोई रीता नहीं है !

हर नशा करके हमनें देखा सनम
प्यार सा कोई भी नशीला नहीं है !

दिल की बात कह दें शायद आँखें
ये रूमाल इतना भी गीला नहीं है !

मेरे बारे में कहे ये पागल ज़माना
के तनहा जीना कोई जीना नहीं है !

इस सागर से कैसे निकलें ‘मिलन’
पार पाने को कोई सफीना नहीं है !!

मिलन “मोनी”

Chaukidaar

5 Sep

उनसे हुआ है जबसे प्यार घोड़े बेच के सोता हूँ
लगाकर पैग बस दो चार घोड़े बेच के सोता हूँ !

बिछा के सेज फूलों की बदन आराम करता है
चुन के राहों से सब खार घोड़े बेच के सोता हूँ !

रहते हैं बनके मेरे हमसफर हमनशीं हमनवा
हर अपने पे कर ऐतबार घोड़े बेच के सोता हूँ !

मज़हब नहीं सिखाता औरों का छीन खाना
खाकर रोटी औ आचार घोड़े बेच के सोता हूँ !

कोई आँखें दिखाए तो आँखें नोचकर रख दूँ
कर दुश्मन को लाचार घोड़े बेच के सोता हूँ !

मुदत्तों बाद मिलीं हैं ये सुकूँने रात ‘मिलन’
डटा है जबसे चौकीदार घोड़े बेच के सोता हूँ !!

मिलन “मोनी”

Desh Drohi

29 Aug

लूटने को घर मेरा जो छुपे यहीं घर में हैं
वो एक एक बाशिंदा अब मेरी नज़र में है !

देखते हैं मुल्क कब तक लूटते रहोगे तुम
आज हरेक जवान मुल्क की फिकर में है !

राहों में मेरी कांटे बिछाने की ना सोचना
तोडनी हमें नागफनी जो मेरी डगर में हैं !

हैं मुल्क में ही मुल्क के दुश्मन छुपे हुए
देश द्रोही आज सभी बस किसी डर में हैं !

लूटने समंदर मल्लाह सभी फ़िराक में थे
इस लिए आज कश्तिया सारी भंवर में हैं !

पिए जिन्होनें जीत के जाम बरसों तलक
हार के भी लोग वो आज उसी असर में हैं !

भेद भाव छोड़ के देश भक्त बन जाओ न
कहाँ मिलेगा सुकूं जो एकता की लहर में है !

सात दशक से अँधेरे में जी रहे थे ‘मिलन’
रौशनी तो अब इस आज़ादी की सहर में है !!

मिलन “मोनी”

Nazaqut

19 Aug

इस ज़ख्मे दिल में नया कुछ भी नहीं है
मरीज़-ए-इश्क की दवा कुछ भी नहीं है !

होंठ बंद रहें मेरे तो यह ना समझ लेना
इन खामोशियों ने कहा कुछ भी नहीं है !

मेरे ख़्वाबों में न आने की जिद है तेरी
शबए-तन्हाइयों में रहा कुछ भी नहीं है !

तूफ़ाने ज़िन्दगी में कुछ भी नहीं बदला
लहर-ए-समंदर में बहा कुछ भी नहीं है !

महक आज भी आये वो ही गुलाबों सी
सैलाब-ए-वक़्त में ढहा कुछ भी नहीं है !

यह माना के वो मेरे रकीब हैं फिर भी
सिवा उम्रेदराज़ के दुआ कुछ भी नहीं है !

तेरी कातिल अदाओं ने है मारा’मिलन’
सिवा नज़ाक़त के सहा कुछ भी नहीं है !!

मिलन “मोनी”

Pata Nahi Chalta

2 Aug

कब किसी दर पर उजाला हो जाए पता नहीं चलता
कब किसी घर में अन्धेरा हो जाए पता नहीं चलता !

ज़िन्दगी भर चलता रहा जो परछाई की तरह साथ
कब किस वक़्त अन्जाना हो जाए पता नहीं चलता !

शम्मा की दीवानगी की खातिर उसपर मंडराते हुए
कब फौत मासूम परवाना हो जाए पता नहीं चलता !

उनकी आगोश और उन झील सी आँखों में डूबकर
कब वस्ले-शब् शायराना हो जाए पता नहीं चलता !

एक नज़र देखूं या नज़र भर कर देखता रहूँ हुस्न
कब दिल जिगर तुम्हारा हो जाए पता नहीं चलता !

जुनूने शौक का आलम या जौके सुरूर-ए-मोहब्बत
कब हुस्न कोई मयखाना हो जाए पता नहीं चलता !

तेरे लब से’मिलन’या तेरी निगाहों से करूँ गुफ्तगू
कब वो लम्हा आशिकाना हो जाए पता नहीं चलता !!

मिलन “मोनी”