Archive | March, 2013

Dhoop Aur Saaya

25 Mar

धूप और साया 

 

रातों को नींद नहीं आती है मुझको, के याद बहुत तेरी आती है मुझको,

इस दिल की नज़र से जब देखता हूँ, बस तूही तू नज़र आती है मुझको.

धूप है, तो साया भी होगा कहीं,

ग़म है, तो सुकू भी होगा कहीं.

ज़िन्दगी के इस पनपते पेड़ पर,

कली है, तो फूल भी होगा कहीं.

इन बागों से होकर जब आती है हवा, तेरे जैसी ही महक आती है मुझको.

महक है तो, इत्र भी होगा कहीं.

प्रेम है, तो दिल भी होगा कहीं.

दीपक तले देख कर, ये जाना,

रात है, तो दिन भी होगा कहीं.

अमावस्या में चाँद नहीं निकलता, फिर भी चांदनी नज़र आती है मुझको,

पानी है, तो मेघ भी होगा कहीं.

नींद है, तो ख्वाब भी होगा कहीं.

कुछ आने, या कुछ जाने के ही,

निशाँ हैं, तो रस्ता भी होगा कहीं.

रातों को नींद नहीं आती है मुझको, के याद बहुत तेरी आती है मुझको,

इस दिल की नज़र से जब देखता हूँ, बस तूही तू नज़र आती है मुझको.

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Aankhon Ka Samander

16 Mar

आँखों का समंदर 

आँखों का ये समुंदर छलक क्यों नहीं जाता,

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.

कुछ पल तो हमभी अपने, सुकून से गुज़ार लेते,

बाहों में उनकी, अपनी कुछ तो रातें सवार लेते,

तूफ़ान यह दिलों का, ठहर क्यों नहीं जाता,

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.(१)

हर बात क्या जुबान से भी, कहना है अब ज़रूरी,

समझेगा कब ज़माना इस प्यार की यह मजबूरी,

आँखों से बात दिल की समझ क्यों नहीं जाता,

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.(२)

छाये हैं हर तरफ ही, तन्हाइयों के बादल,

प्यासे दिलों को और करने लगे हैं पागल,

झोंका कोई हवा का, इधर क्यों नहीं आता,

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.(३)

इतने करीब हैं मगर फिर भी कुछ दूरियां,

बज रहीं है हर तरफ प्यार की शहनाइयाँ,

पत्थर यह रास्ते का पिघल क्यों नहीं जाता.

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.(४)

आँखों का ये समुंदर छलक क्यों नहीं जाता,

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.