Archive | March, 2014

Jalte Deep Se Poochho

12 Mar

जलते दीप से पूछो

चाहें जलते दीप से पूछो, या पूछो बुझती बाती से,

आंसू बन जाते हैं साथी, जीवन के एकाकीपन के.

….चाहें जलते दीप से पूछो…………

जीवन तो करुणा में पलकर,

चिर यौवन तक आता है,

कोई किसीको दर्द के बदले,

ख़ुशी नहीं दे पाता है,

चाहें अपने दिल से पूछो, या पूछो खामोश नज़र से,

आंसू बन जाते हैं साथी, जीवन के एकाकीपन के.

….चाहें जलते दीप से पूछो…………(१)

आंसुओं की बूँद बूँद का,

वेदना से है सम्बन्ध,

इनके आने जाने पर तो,

कोई नहीं रहता प्रतिबन्ध,

चाहें अपने मन से पूछो, या पूछो घनघोर घटा से,

आंसू बन जाते हैं साथी, जीवन के एकाकीपन के.

….चाहें जलते दीप से पूछो…………(२)

याद किसीकी दिल को आकर,

इतना क्यों तडपा जाती है,

मायूसी भी तरल में ढलकर,

आँखों से बहती जाती है,

चाहें घटाओं से तुम पूछो, या पूछो सूखे पतझड़ से,

आंसू बन जाते हैं साथी, जीवन के एकाकीपन के.

….चाहें जलते दीप से पूछो…………(३)

शाम ढले तो रात का आना,

तो निश्चित हो जाता है,

प्रेम स्वप्न की गहराई में,

दिल कही खो जाता है.

चाहें ढलती धूप से पूछो, या पूछो सूने आँगन से,

आंसू बन जाते हैं साथी, जीवन के एकाकीपन के.

….चाहें जलते दीप से पूछो…………(४)

उठती गिरती लहरों का कोई,

अर्थ समझ नहीं पाया है,

सागर की गहराई का ही,

दिल पर गहरा साया है,

चाहें तूफानों से पूछो, या पूछो वीरान तटों से,

आंसू बन जाते हैं साथी, जीवन के एकाकीपन के.

….चाहें जलते दीप से पूछो…………(५)

जीवन के भवसागर में तो,

सुख दुःख की लहरें होती है,

एक गगन में सूर्य कभी तो,

कभी चन्द्र किरण होती है,

चाहें चलते वक़्त से पूछो, या पूछो बीते पल पल से,

आंसू बन जाते हैं साथी, जीवन के एकाकीपन के.

….चाहें जलते दीप से पूछो…………(६)

कितने पल अपने हो कर भी,

अपने नहीं रह पाते हैं,

कुछ नगमे ऐसे होते है

मन को जीत नहीं पाते है,

चाहें रीते घट से पूछो, या पूछो सूने पनघट से,

आंसू बन जाते हैं साथी, जीवन के एकाकीपन के.

….चाहें जलते दीप से पूछो…………(७)

बात इशारों में हो चाहें,

या गीतों में वो ढल जाये,

वीणा के तारों को देखो,

छिड़ते ही ये मन भर जाए,

चाहें सिसकते साज़ से पूछो, या पूछो खामोश लबों से,

आंसू बन जाते हैं साथी, जीवन के एकाकीपन के.

….चाहें जलते दीप से पूछो…………(८)

चाहें जलते दीप से पूछो, या पूछो बुझती बाती से.

आंसू बन जाते हैं साथी, जीवन के एकाकीपन के.

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Aanchal me chand

6 Mar

आँचल में चाँद

         

आँचल में रूप छुपता तो कभी निखरता है,

वसले-शब् पे चाँद जैसे शर्माता निकलता है.  

पुरानी तड़प ही थी तेरी मोहब्बत की दबी,  

वर्ना बाहों में आकर भी कौन सिसकता है.

आँखों में दो मोती छलके छलके देख लगा,

सीने में जैसे कोई इश्के-पत्थर पिघलता है.

हवा कुछ यूँ बिखेर देती है जुल्फों को तेरी,

के रुखसार पे घटाओं का पहरा थिरकता है,

इशारों इशारों मे कुछ भी न कह पाए तुम,

दिल की कहने में कौन इतना हिचकता है.

आँख का फड़कना, शायद कुछ अच्छा हो,

पग बढ़ाओ तभी घुंघरू, ज़रूर थिरकता है.

तेरे मिलने की शायद ना उम्मीद थी वार्ना,

जानी-पहचानी राहों में ही कौन बिछड़ता है.

आँचल में रूप छुपता तो कभी निखरता है,

वसले-शब् पे चाँद जैसे शर्माता निकलता है.