Archive | October, 2015

Hoti Jaa Rahi Hai

22 Oct

कैसी यह ज़िन्दगी आज होती जा रही है
खोखली मकानों की नीव होती जा रहीं हैं

दीखता नहीं एक भी घर जैसा आसपास
ऊँची इमारतें और ऊँची होतीं जा रहीं हैं

दालों की भी दाल अब गलती नहीं देखो
महगाई आसमान तक होती जा रही है

एक दाना भी हिस्से में न आए शायद
इजाफे आबादी इस क़दर होती जा रही है

खेतों को वक़्त पर पानी नहीं मिलता
अब बारिशों पर बारिशें होती जा रहीं हैं

गाँव सिमट सिमट के शमशान बन गए
किसानों की सज़ाएमौत होती जा रही है

कागजों पर देश पर अमीर की मोहर है
पर जनता, और गरीब होती जा रही है

वक़्त पर क्या किया सरकार ने मिलन
लोकतंत्र की नाव अब डूबती जा रही है

कैसी यह ज़िन्दगी आज होती जा रही है
खोखली मकानों की नीव होती जा रहीं हैं

Reh Gayi Hai

16 Oct

आँखों में एक नमी सी रह गयी है
ज़िन्दगी में कुछ कमी सी रह गयी है

सभी पतंगें उड़ रहीं हैं आसमान में
मगर मेरी डोर कुछ छोटी रह गयी है

बीज तुलसी के डाले तो थे गमलों में
फिरभी प्यासी कुछ ज़मीं रह गयी है

पत्ते तो निकले पर पनप नहीं पाए
धूप की शायद कमी सी रह गयी है

उनसे कहना बहुत कुछ था मिलन
बात दिल की दिल में ही रह गयी है

आँखों में एक नमी सी रह गयी है
ज़िन्दगी में कुछ कमी सी रह गयी है

Kaha Tha

8 Oct

मैं रास्ते के पत्थरों से टकरा जो गया था
हर पग पर हैं ठोकर ये ज़माने ने कहा था

भिगोते हैं दामन दुःख-सुख में तो हमही
आँखों से निकलते हुए अश्कों ने कहा था

हँसते हुए ही गुजारो ज़िन्दगी के ये सवेरे
घिरतीं हुईं रातों के अंधियारों ने कहा था

छोड़ दिए जब तशनालबी के सभी आलम
निगाहें शौक ने तब मुझे पीने को कहा था

रख दिया जब आखिरी, पत्थर भी “मिलन”
ज़माने के रिवाजों ने तब जीने को कहा था

मैं रास्ते पर पत्थरों से, टकरा जो गया था,
हर पग पर हैं ठोकर, ये ज़माने ने कहां था.

Kuchh Humaare, Kuchh Tumhaare Hon

8 Oct

कुछ रंग हमारे हों, कुछ रंग तुम्हारे हों
कुछ पल हमारे हों, कुछ पल तुम्हारे हों

ज़िन्दगी में प्यार की इस दीवार पर अब
कुछ चित्र हमारे हों,कुछ चित्र तुम्हारे हों

प्रेम ग्रन्थ के पन्नों पर लिखे जाने वाले
कुछ गीत हमारे हों,कुछ गीत तुम्हारे हों

आँखों से बहने वाले इन खारे अश्कों में
कुछ ग़म हमारे हों,कुछ ग़म तुम्हारे हों

एक दूजे का दोनों में हो जाए “मिलन”
कुछ तुम हमारे हो, कुछ हम तुम्हारे हों

कुछ रंग हमारे हों, कुछ रंग तुम्हारे हों
कुछ पल हमारे हों, कुछ पल तुम्हारे हों

“मिलन”

Shavaab Baki Hai

6 Oct

शवाब बाकी है

चांदनी रातों का अभी भी शवाब बाकी है
वस्ल-ऐ-शब् का अभी भी खुमार बाकी है

तेरी आँखों के मयकदे से छलकी कभी जो
इन पैमानों में अभी भी वो शराब बाकी है

मुस्कुरा कर तुमने क्यों फेर लीं थीं नज़रें
मेरे दिल में अभी तक वो सवाल बाकी है

मैं सुनी सुनाई बातों पे क्यों विशवास करूँ
क्या तेरे मन में अभी कुछ गुबार बाकी है

हुस्ने-बेमिसाल ने जो सवाल उठाए मुझसे
इन आयनों से अभी उनका जवाब बाकी हैं

जानते थे पर पहचान नहीं पाए “मिलन”
उन चेहरों पर अभी भी वो नकाब बाकी है

चांदनी रातों का अभी भी शवाब बाकी है
वस्ल-ऐ-शब् का अभी भी खुमार बाकी है !!

“मिलन”