Archive | May, 2016

Manzar

16 May

कल मेरे शहर का यह क्या मंज़र होगा
किसी हाथ पत्थर किसी में खंजर होगा

मरने पर न मिलेगा एक बूँद गंगा जल
खून का हर तरफ लेकिन समंदर होगा

आज साहिष्णुता पे उठे हैं सवाल इतने
यहाँ क़ानून तोडने वाला सिकंदर होगा

बाद बारिश न आयगी वो सोंधी सुगंध
कहीं आंधी कहीं धूल भरा बवंडर होगा

हम जंगलों की तरफ वापस लौटे जहाँ
इंसान तहजीब से जानवर बर्बर होगा

एक नई फसल को हम उपजा रहे हैं
ज़मीर का हर टुकड़ा जहाँ बंजर होगा

ऊपर से जितना है गरम दिल ‘मिलन’
उतना बर्फ का दरिया तो अंदर होगा !!

कल मेरे शहर का यह क्या मंज़र होगा
किसी हाथ पत्थर किसी में खंजर होगा

Zaroori Nahi Raha

14 May

आदमी का इंसान होना अब ज़रूरी नहीं रहा
मुनासिब रास्ते पे चलना भी ज़रूरी नहीं रहा

ले नहीं जाता कोई कदम अब मंजिलों तलक
उम्मीद किसी पर रखना भी ज़रूरी नहीं रहा

देने कोई झूठी तसल्ली दिल तक नहीं आता
किसीके ज़ख्म का भरना भी ज़रूरी नहीं रहा

ज़िन्दगी खुद ही तो एक सज़ा सी हो गयी है
आदमी का होना मुजरिम भी ज़रूरी नहीं रहा

फ़रिश्ते भी अब गुहार सुनते नहीं हैं ‘मिलन”
विश्वास किसी मजहब में ही ज़रूरी नहीं रहा !!

आदमी का इंसान होना अब ज़रूरी नहीं रहा
मुनासिब रास्ते पे चलना भी ज़रूरी नहीं रहा

Intehaa

12 May

नहीं जानता वो क्या चाहता है
तेरे प्यार की इन्तेहा चाहता है

देख जिसे दिल हो जाएँ पागल
अदाओं में ऐसी अदा चाहता है

सौदा हमें रास आया न उनका
बदले जफा कर वफ़ा चाहता है

मुझको न उड़ने देता ज़रा और
उमीदों के पर क़तरना चाहता है

बिगड़ जाऊं मैं यह गवारा नहीं
सुधर जाऊं येभी नहीं चाहता है

बीच भवर मेरी कश्ती ले जाओ
दिल न किनारे डूबना चाहता है

आयना अब क्या देखूं “मिलन”
चेहरा खुद ही बदलना चाहता है

नहीं जानता वो क्या चाहता है
तेरे प्यार की इन्तेहा चाहता है

मिलन “मोनी” १२/५/२०१६