Archive | December, 2013

Dhadak Lene Do

6 Dec

अपनी धडकनों में मुझे धड़क लेने दो,

एक रात आँखों में मुझे ठहर लेने दो,

बिखरता रहा हूँ हर सहर तिनकों सा,

इस रात बाहों में मुझे सिमट लेने दो,

एक चेहरा छुपा है जो तेरी जुल्फों में,

मेरे आयने में उसे ज़रा उतर लेने दो,

दर्द होंठों से शायद ना हो पाए बयाँ,

जुबां आँसुओं की मुझे समझ लेने दो,

बर्फ हो जाए ये मुहब्बत का मौसम,

प्यार का शोला दिलमें दहक लेने दो.

बदल न जायें रास्ते दोराहा आते आते,

साथ अपने कुछ कदम बहक लेने दो.

अपनी धडकनों में मुझे धड़क लेने दो,

एक रात आँखों में मुझे ठहर लेने दो,

Chand

5 Dec

चाँद

चाँद घटाओं में कभी छुपता-निकलता है,

ये ज़माने की निगाहों से शायद डरता है,

इसमें कवि-कल्पना और सृजनात्मकता है,

मनमोहक-सोंदर्यपूर्ण चेहरों का प्रतिरूप है,

वृक्षों के झुरमुटों के पीछे मुस्कुराता चाँद,

तन मन को रोमांचित कर जाता है चाँद,

अद्रश्य वासनाओ का ये जगाता आवेश है.(१)

नीली झील की गहराई तक उतर जाता है,

किनारे सिरहानो पे चांदनी बिखेर जाता है,

स्मृतिपट पर विस्मृत यादें उभार जाता है,

शीतल-शांत-निष्क्रिय फिरभी उन्मादक है,

रजनीगंधा और रातरानी का तो श्रृंगार है,

हिमाच्छादित-पर्वतशिखर को छूता है चाँद,

अबोध बालक की जिज्ञसा जगाता है चाँद,

यही है चाँद-औ-चांदनी का निशब्द संवाद.(२)

आकार में कभी ये घटता कभी बढता है,

राशियों को अनुकूल बनाता सवारता है,

नभ पर सितारों की ओढ़नी फहराता है,

खिड़की-शयन-कक्ष से जो झाकता है चाँद,

सूनी रातों में दिल तक डरा देता है चाँद,

यही इसका रूप-सौन्दर्य-आकर्षण लुभाव.(३)

चकोर की आँखों की अनन्त प्यास है,

प्रणय-संगीत की मधुर लय-औ-ताल है,

सागर-लहरों के उतार-चढ़ाव का कारण है,

शिशु-कथाओं-ओ-परियों का आवास है चाँद,

कई धर्म-रीती-रिवाज़ का आविष्कार है चाँद,

ये है इसका अद्वितीय रूप और प्रभाव.(४)

रात्रिबेला के पलपल का सम्पूर्ण प्रशासक,

मनुष्य और इस सृष्टि का भाग्य विधाता,

स्वप्न-चित्रपट पर चित्र विचित्र बनता है,

सूर्योदय पर शितिज में गुम हो जाता है,

पर रात भर सूर्य से आलोकित रहता है,

रूप सोंदर्य श्रृंगार का प्रतिदर्पण है चाँद,

उदास क्षणों कोभी आनंद दे देता है चाँद,

इसी का है स्वम्-अभिमान और गुमान.(५)

चाँद घटाओं में कभी छुपता-निकलता है,

ये ज़माने की निगाहों से शायद डरता है,

………………………………………………………………..५/१२/२०१३

 

Chitrakaar

3 Dec

ऐ मेरे मन के चित्रकार,अब एक ऐसा चित्र बना दे तू,

ह्रदय के कलुषित भावों को,बस किसी तरह छुपा दे तू,

देख सके उन्हें ना कोई,ऐसा उपयुक्त  रंग चढा दे तू.

ऐ मेरे मन के चित्रकार ………. (१)

नयनो की भाषा का अभिप्राय,उसमे तुम समझा देना,

मौन अधरों की मायूसी पर थोड़ी,मुस्कान थिरका देना,

घोर रजनी बेला में भी एक,प्रज्वलित मार्ग दर्शा दे तू,

ऐ मेरे मन के चित्रकार ……….(२)

शाखों पे मुस्काने वाली हर,कली गजरे में सजवा देना,

मेघों से गिरने वाली हर बूँद का प्रयोजन समझा देना,

मिटटी की सोंधी सुगंध का,आभास जरा करवा दे तू.

ऐ मेरे मन के चित्रकार ……….(३)

इस पतझड़ और बहार को,एक नवीन स्वरुप दे देंना,

धरती और गगन की,दूरी बेझिझक तुम मिटा देना,

जीवन के नित झंझावातो की,कुछ लहरें उभरा दे तू.

 ऐ मेरे मन के चित्रकार ……….(४)

पुष्पों को धर्यशील बना दे, शूलों को कोमलता दे देना,

   ब्रहम जीव की माया को भी,आलोकित तुम करवा देना,

जीवन के सब इन्द्रधनुषी स्वप्नों को,सम्पूर्ण बना दे तू.

ऐ मेरे मन के चित्रकार ………. (५)

होनी-अनहोनी का ज़रा,सम्बन्ध तुम  समझा देना,

मिलन और विच्छेद में जोभी, मतभेद है मिटा देना,

समय की गति को किसी तरह,मेरे अनुकूल बना दे तू,

ऐ मेरे मन के चित्रकार ………. (६)

राहों पे उठने वाला,हर पग मंजिल तक पंहुचा देना,

धरती और गगन की दूरी,शितिज पर मिलवा देना,

जीवन चक्र के भवसागर की एक,लहर दिखला दे तू.

ऐ मेरे मन के चित्रकार,अब एक ऐसा चित्र बना दे तू,

ह्रदय के कलुषित भावों को,बस किसी तरह छुपा दे तू,