Archive | December, 2017

Ahsaas-e-Kashmkash

25 Dec

एक आज़ाद परिन्दे सी है यह ज़िन्दगी
आसमां तो कभी ज़मीं है यह ज़िन्दगी !

हर मोड़ खुद में एक इत्तेफाक होता है
धूप-छाँव सी मुस्काती है यह ज़िन्दगी !

कहीं खिलतीं बहारें तो कहीं हैं खिजाएँ
मौसम के इख्तियार में है यह ज़िन्दगी !

मुसलसल मगर मुश्किल सफर है यही
बड़े नसीबों से मिलती है यह ज़िन्दगी !

कहते है कुदरत का अजब तमाशा इसे
लेकिन कोई खेल नहीं है यह ज़िन्दगी !

कभी रंजिश कभी मोहब्बत है ‘मिलन’
एहसास-ऐ-कशमकश है यह ज़िन्दगी !!

मिलन “मोनी”

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Aaj Ki Raat

22 Dec

बाद मुद्दतों के तो आई थी आज की रात
महक उठी थी चांदनी तक आज की रात !

हवाओ में लचकती डालियों सी अंगडायी
आँखों से नींद उड़ा गयी है आज की रात !

बागों में खिल गयीं जो बेला और चमेली
गंध भीनी भीनी छाती रही आज की रात !

शबे वस्ल का यह आलम रंगीन था और
उनको वापस भी जाना था आज की रात !

खामोशी की एक तड़प छोड़ गयी मुझमें
एक सूनी दास्ताँ बन गयी आज की रात !

शबे-निस्ता के बिस्तरों तुम देना गवाही
क़त्ल मेरा करके चले गए आज की रात !

मजरूह कर गया तेरा साया भी ‘मिलन’
जलती शमा बुझा गयी ये आज की रात !!

मिलन “मोनी”

Sazaa

16 Dec

जब खता थी आपकी कातिल अदाओं की
मुझे सज़ा मिली आखिर किन गुनाहों की !

ज़ख्म मेरे खुद अब तो दे रहे हैं गवाही
क्या मिली सौगात ये मुझको बफाओं की !

उनको खुश देखा तो खुद अच्छे हो गए
मरीज़े दिल को चाह नहीं अब दवाओं की !

एक सदा में देख लेते थे पलट मुझ को
कद्र उनको नहीं है अब उन्ही सदाओं की !

प्यार की दरिया में रहते हैं जो सराबोर
उम्मीद कहाँ रहती है उनको जफ़ाओं की !

राहे इश्क नहीं होती है आसान ‘मिलन’
आशिक को चाह सदा होती दुआओं की !!

मिलन “मोनी”

Husne-babaal

7 Dec

अनसुना करते हैं वह मेरे सवाल को
दीवानगी कहते हैं वो मेरे सलाम को !

गज़लसाज़ कहता नज़्म तेरे हुस्न पे
नज़र अंदाज़ करोगे किस कलाम को !

रोना या हंसना दोनों सूरतों में छलकें
पहचान गए तेरी तो नज़रें जमाल को !

बैठोगे कब तक तुम आयने के सामने
संवारोगे और कितना हुस्ने-बबाल को !

मुन्तजिर है तेरी मुख़्तसर सी ज़िंदगी
जाने न दूंगा खाली मैं इश्के-गाम को !

कुछ ख़ुशी तो लायी रौशनी ‘मिलन’
शायद सुकूँ मिले अब मेरे ख़याल को !!

मिलन “मोनी”

Hayaat

1 Dec

कैसी हयात से खुदा ने हमें नवाज़ा है
इस घर में खिड़की न कोई दरवाज़ा है

कौन मेरा जख्मे दिल देख पायगा अब
के मेंरा गम आज कितना तरोताज़ा है

शब ढलते ढलते खुदही जल जाउंगा मैं
इन चरागों का भी तो यही अन्दाजा है

वो एक सफर एक इम्तेहां एक मंजिल
वक़्त का आखिर यही एक तकाजा है

खुद अपने कंधों पर उठा रहा ‘मिलन’
कोई और नहीं मेरा अपना जनाज़ा है !!

मिलन “मोनी”Hayaat