Archive | April, 2013

Chupana Dard

22 Apr

छुपाना दर्द 

 

छुपाना दर्द इतना भी कोई आसान नहीं होता,

गमो में मुस्कुराना ही दवा से कम नहीं होता.

मोहब्बत आग है ऐसी जो दिल को जलाती है,

ऐसी आग में जलकर किसीको गम नहीं होता.

पिये है जाम यूँ कितने तेरी आँखों से लेकिन,

तेरे होंठों से पीने में नशा भी कम नहीं होता.

बुझते है वो ज़िन्दगी के झंझावातों से अक्सर,

जिन चरागों में लड़ने का कुछ दम नहीं होता.

जो होना है उसे तो वक़्त भी टाल नहीं सकता,

किस्मत की लकीरों पर भरोसा कम नहीं होता.

फंसी हों कश्तियाँ जब भंवर की तेज़ लहरों में,

एक तिनके का सहारा भी कुछ कम नहीं होता.

छुपाना दर्द इतना भी कोई आसान नहीं होता,

गमो में मुस्कुराना ही दवा से कम नहीं होता.

 

Anchaha Silsila

16 Apr

अनचाहा सिलसिला

न जीने की आरज़ू है, न मरने का हौसला है,

न रास्ते पर मंजिल, न मंज़िल का रास्ता है,

वो मिलते नहीं, तो चैन मिलता नहीं,

वो मिलते हैं जब, नज़र मिलती नही

लाख चाह कर भी, कुछ कह न सके,

बात करने को, कोई बात मिलती नहीं,

किसी कशमकश में शायद दिल का कारवां है, न जीने की आरज़ू है, न मरने का हौसला है,

तुम तो पिलाते रहे, और हम पीते रहे,

अश्क आते रहे, और वो मुस्कुराते रहे,

है इलाज नहीं कोई भी, ज़ख्मों का मेरे,

पुराने भरे तक नहीं और नए लगते रहें

अब बची कोई मन्नत, और न कोई दुआ है, न जीने की आरज़ू है, न मरने का हौसला है.

कुछ कदम उठाये, जो गलत हो गए,

कुछ सपने सजाये, जो कफ़न हो गए,

बादल उम्मीदों के, तो घिरे हर तरफ,

कुछ बरसे ही नही, कुछ दफ़न हो गए,

मेरी राहगुज़र पर, यह अनचाहा सिलसिला है. न जीने की आरज़ू है, न मरने का हौसला है.

न जीने की आरज़ू है, न मरने का हौसला है,

न रास्ते पर मंजिल, न मंज़िल का रास्ता है.

Sirhan

9 Apr

सिरहन 

सिरहन सर्द हवा की,

उसपर,

आगोश की तपन,

ठहर गया मौसम,

बदचलन.

बिखरी कपकपाती धूप,

दूब के फर्श पर,

ओस पर फैला,

पीलापन,

याद हो आई,

अनायास,

वो पहली बरसात.

बर्फ हो गए हाथ,

पहचान एक आहट की,

समझ आ गयी,

अचानक,

उमड़ ही गया,

आँखों में,

आंसू एक बेईमान.

दूर तक आ गए,

रास्ते,

मेरे साथ,

इनसे क्या पूछें,

इस मौसम का हाल.

उम्र भर टूटने का,

अहसास,

करा गया आखिर,

एक सवाल,

क्या यथार्थ को,

सपने,

आते नहीं रास.

सिरहन सर्द हवा की,

उसपर,

आगोश की तपन,

ठहर गया मौसम,

बदचलन.

Labrez

6 Apr

 लबरेज़ 

 

जलती शमा का परवाना हूँ, कुछ ऐसा दीवाना हूँ,

मोहब्बत की मदहोशी से, लबरेज़ एक पैमाना हूँ.

मरीज़-ऐ-हुस्न हूँ, इश्क-ऐ-सुरूर आने दे,

मेरे नाशाद दिल को कुछ करार आने दे,

चलो तय कर  लें मामला-ऐ इश्क दोनों,

कुछ और मुझको अपने करीब आने दे.

मदभरी आँखों से छलका, छलका हुआ मैखाना हूँ.

मोहब्बत की मदहोशी से, लबरेज़ एक पैमाना हूँ.

बात जो दिल में है जुबान पर आने दे,

जो ख्वाब देखें हैं, अंजाम तक आने दे,

बीच की दीवारें ज़रा तोड़ कर देख लो,

घर में रोशनी की किरण तो आने दे,

तेरी शोख जवानी जैसा, एक अल्हड आवारा हूँ.

मोहब्बत की मदहोशी से, लबरेज़ एक पैमाना हूँ.

यौवन पर कलियों सा निखार तो आने दे.

वस्ल-ऐ-इश्क की इधर लहर तो आने दे.

टूट जायगा इंतज़ार पलक झपकते ही,

ज़रा रात ढले और सहर तो आने दे.

मंजिल दर मंजिल भटक रहा हूँ, ऐसा बंजारा हूँ,

मोहब्बत की मदहोशी से, लबरेज़ एक पैमाना हूँ.

खिली हुई कली में निखार तो आने दे,

चेहरे पर जुल्फों का बादल तो छाने दे,

इन चंचल हवाओं का अंदाज़ देख कर,

महकी महकी इधर महक बस आने दे.

गुलशन में बहती हवाओं से, कितना अनजाना हूँ,

मोहब्बत की मदहोशी से, लबरेज़ एक पैमाना हूँ.