Archive | January, 2017

Chingariyan

25 Jan

तन्हाइयां कहीं तो मेरे साथ पल रहीं हैं
खामोश यह हवाएं मेरे साथ चल रही हैं

एक अजीब सा रंग आसमां का हो गया
शायद चांदनी में कोई आग जल रही है

अपना साया परवाज़ में देख नहीं पाते
परछाइयाँ खुदही परिंदों को छल रही हैं

इश्क की गहराइयां बाकमाल हैं जिनमें
अंगडाइयां तेरी अदाओं को खल रही हैं

ये आयना भी अब मुझे पहचानता नहीं
उम्र यहाँ वक़्त के साथ ही ढल रही है

हुस्न की चिंगारियां हैं ‘मिलन’ जिनमें
तपकर आजतक तेरी दाल गल रही है !!

मिलन “मोनी”

Chaht

25 Jan

तेरी चाहत से बढ़ कर कोई चाहत नहीं रही
यह मोहब्ब्त है मेरी कभी तिजारत नहीं रही

हर एक को यूँ तो रहती है चाहत दौलत की
पर इश्क से बढ़कर दिल को राहत नहीं रही

ये दुनिया अब रास ही नहीं आती है मुझको
इसमें अब बफाओं की कोई कीमत नहीं रही

हर एक इंसा का यूँ तो खुदा होता है अपना
कभी प्यार से बढ़कर कोई इबादत नहीं रही

तेरी मुस्कराहट की बस एक झलक है काफी
इस्से ज़्यादा की मुझको तो ज़रुरत नहीं रही

आयने में अक्स अपना देख करके ‘मिलन’
और किसीके साए से हमें अदावत नहीं रही !!

मिलन “मोनी”

Aapadhaapi

25 Jan

जीवन की आपाधापी में किसको फुर्सत मिलती है
फिर भी ये धड़कन मेरी तेरी धड़कन से मिलती है

मेरी आहट सुनते ही दिल धक से तेरा हो जाता है
कुछ तो बात है मुझमें जो तू आआ कर मिलती है

मेरे दिल के टुकड़े होकर राहों में तेरी बिछ जाते हैं
तेरी कातिल आँखों से जब ये मेरी नज़र मिलती हैं

मैंने तेरी फुरक़त में ऐसी कुछ तनहा रातें गुजारीं हैं
रूह मेरी आ करके गले जहाँ तेरी रूह से मिलती है

तन में देखा मन से देखा फिर धन तक रख देखा है
सच्ची ख़ुशी वही जो मुझको तेरे मिलने से मिलती है

एक नया जीवन सा अपने ‘मिलन’ से खिल जाता है
वसले शब् में तेरी साँसे जब साँसों से मेरी मिलती है !!

मिलन “मोनी”

Ishtehaar

24 Jan

शहर के हर
नुक्कड़
हर चौराहे पर
दफ्तरों की दीवारों पर
सभी सार्वजनिक स्थानों पर
कोठियों पर
सरकारी इमारतों पर
बाज़ारों और स्कूलों पर
यह इश्तेहार लगवा देना
के आदमी यहाँ कहीं
गुम हो गया है,
हिन्दू बहुत हैं
मुसलमान बहुत हैं
सिख हैं काफी
ईसाई बहुत हैं
पर इंसान नहीं मिल रहा
और इसलिए किसी समस्या का
हल नहीं मिल रहा
खोज कर लाने वाले को
उचित इनाम मिलेगा,
ये मेरा वादा है !!

मिलन “मोनी”

Phli Dafa

19 Jan

उलझनों में दिल पड़ा पहली दफा
आपसे मिल कर गया पहली दफा

शर्म से वो लाल कितना हो गए थे
सामना जब तब हुआ पहली दफा

वो हसींन मंज़र मैं कैसे बयाँन करूँ
चाँद जुल्फों में घिरा पहली दफा

बात पूरी हो गयी इक गज़ल से
शेर जो उसपर कहा पहली दफा

भूले नहीं लम्हा वो आज तलक
आपके सदके गया पहली दफा

हर दुश्वारी पर मुस्काये ‘मिलन’
अश्क आँखों से बहा पहली दफा

मिलन “मोनी”

Khayali

14 Jan

मेरी ज़िन्दगी की अजब सी कहानी है
न नमक न मिर्च न ही कोई रवानी है

कोई पत्थर ही फेंक दे तो और बात है
वर्ना झील में जैसे ठहरा हुआ पानी है

कैसा मैं बागबाँ हूँ के जिसके बागों में
न फूल हैं न खुशबू ना ही हरियाली है

प्यार की अनसुनी दास्ताँ है के जिसमें
न सोहनी ना राधा ना मीरा दीवानी है

उस दौरेउम्र से गुज़र रहा हूँ मैं के जहाँ
न बचपन न बुढापा और न जवानी है

कुछ नहीं तो क्या ये ज़िन्दगी नहीं है
यह कोरा ख़याल ही फ़क़त खयाली है

साथ जबजब तुम मेरे होते हो’मिलन’
वक़्त का हर लम्हा कितना रूहानी है !!

मिलन “मोनी”