Archive | August, 2016

Khuda Ka Ishaara

30 Aug

उनसे मिलने का भी कोई इरादा न रहा,
दिल में रह कर भी वो आँख का तारा न रहा !

अब शिकायत करूँ मैं कहाँ औ किस से,
गर्दिशों में जो खुदा का भी इशारा न रहा !

हम लकीरों में तकदीर लिए फिरते हैं,
फिर भी तकदीर का कोई भरोसा न रहा !

एक वक़्त जब उनका ही ज़िक्र रहता था,
आज कल हुस्न का वही जलवा न रहां !

आयना टूट के शायद ये बिखर जाएगा,
अक्स भी हूँबहू इसमें हमारा न रहा !

जानें किस धार में बहती रही कश्ती मेरी,
दो किनारों में से कोई एक हमारा न रहा !

अपने अश्कों को ज़माने से छुपाऊं कैसे,
जेब में अपनी तो रूमाल हमारा न रहा !

दुश्मनों का तो ऐतबार नही था ‘मिलन’,
दोस्तों का भी अब कोई सहारा न रहा !

मिलन “मोनी”

Kaise Kaise Log

29 Aug

” कैसे कैसे लोग ”

नफरतें दिलों में ले के चलते हैं,
कैसे कैसे ये लोग मिलते हैं !

अब मुकम्मल बात नहीं होती,
लोग टुकड़ों में बात करते हैं !

खार रस्ते पे मत बिछाओ तुम,
नंगे पाँव हम उधर गुज़रते हैं !

आपकी आख से नशा कर के,
कितनी मुश्किल से हम सँभलते हैं !

रंग होंठों का लाल हो जाए,
जब दिलों में गुलाब खिलते है !

हुस्न तेरा कितना है बेमिसाल,
ये आयने भी खूब समझते हैं !

मुश्किलों से डर नहीं लगता,
फूल काँटों में भी खिलते हैं!

इन ग़मों का हिसाब क्या रखना,
ये तुम्हीं से ही तो मिलते हैं !

दिल्लगी हो गयी बहुत ‘मिलन’,
अच्छा अब हम भी घर निकलते हैं !

मिलन “मोनी”

Baithhe Baithhe

28 Aug

” बैठे बैठे ”

ख्वाब आँखों में हम सजा बैठे,
आपकी हाँ में ही हाँ मिला बैठे !

जलाए हमने रौशनी की खातिर
उन चरागों से ही घर जला बैठे !

तदबीर से कुछ गिला तो नहीं,
फिर भी तकदीर आजमा बैठे !

दर्द तो हो गए ज़ाहिर उन पर,
अश्क आँखों से हम गिरा बैठे !

बेखुदी में ये क्या कर दिया है,
उस बेबफा से ही कर बफा बैठे !

पत्थर दिल से कुछ नहीं हासिल,
कुछ कहो और कुछ बना बैठे !

नफरतों के इन मकानों में देखो,
छत अमन की हम बिछा बैठे !

कुछ शक और शिकायतों की खातिर,
दूरियां अपनों से ही बना बैठे !

पत्थरों के इस शहर में आज हम,
शीशे का आशियाना बना बैठे !

मेरी खामोशियों ने कहा कुछ नहीं और,
क्या क्या न जाने वो सुना बैठे !

गले से मुसीबत खुद लगा बैठे,
हिन्द और पाकिस्तां बना बैठे !

तमन्ना थी बस फूलों की’मिलन’,
बाग़ काँटों का हम लगा बैठे !!

मिलन “मोनी”

Nahi Hai

27 Aug

बतानी नहीं और छुपानी नहीं है
कोई बात दिल से लगानी नहीं है

कहीं आग पानी न बन जाए देखो
वसले शब् तनहा लुटानी नहीं है

आँखों ही आँखों में कह दीजियेगा
जो बात होंठों पे लानी नहीं हैं

कुछ शेर मेरे पसन्द आ रहे है
पर शायरी मुझको आती नहीं है

खुद तुम ज़रा इनको गाके तो देखो
मेरी गज़ल गुनगुनाती नहीं है

जान की बाज़ी लगाईं है हमने
मोहब्ब्त है कोई कहानी नहीं है

बुझा दो चराग़ो को फिर देखना तुम
अँधेरे की कोई कहानी नही है

मुहब्बत भी करके देखा है हमने
के मीरा सी कोई दीवानी नहीं है

दिलों में अदावत लबों पे मोहब्बत
ये बाज़ीगरी काम आनी नहीं है

ज़माना कितना खुदगर्ज़ हो गया है
मुरव्वत का आँखों में पानी नहीं है

लेते हो दर्द सबका ‘मिलन’ तुम
आदत बुरी यह चुरानी नहीं है !!

मिलन “मोनी”

Vakif Hain

25 Aug

ज़िन्दगी हम तेरी मौजे कहर से वाकिफ हैं
दिल की कश्तियाँ लहर लहर से वाकिफ हैं

दिखाते हैं सब मगर कोई हमारा नहीं होता
हम दिलजलों की नज़र नज़र से वाकिफ हैं

सहर होने तक नहीं दिखेंगे उजाले कहीं पर
हम इन अन्धेरों के पहर पहर से वाकिफ हैं

जाने कौन सी बात कब लग न जाए मन को
आँखों से बहने वाली नहर नहर से वाकिफ हैं

वो मोहब्ब्त की किस गली से गुज़र सकते हैं
हम दिल के हर एक शहर शहर से वाकिफ हैं

नफरत किसी से भी करते नहीं’मिलन’जबकि
हम इंसानों में पलते जहर जहर से वाकिफ हैं

मिलन “मोनी”

Zara Si Baat

24 Aug

छलकते रहें ये पैमाने और गुलाबी रात हो
बात हो तो सिर्फ उनकी नज़रों से बात हो

भीग रहा हो चांदनी से ये नूरे बदन उनका
दिल के आसमांन से इश्क की बरसात हो

पलक झपकते ही मिट जाएँगे अन्धेरे सारे
तेरे हुस्न का सूरज अगर सफर में साथ हो

बना देगी यह दनिया हरबार बड़ा अफ़साना
हमारी नज़र में शायद वह ज़रा सी बात हो

दिल हार जाने में ही शायद जीत है मिलन
तन्हाईयाँ हों मगर उनकी बाहों में शाम हो

मिलन “मोनी”

Ban Ke Dekh

18 Aug

कभी तो दिल के आसमां पे चाँद बन के देख
वसले शब् में मेरे लबों की प्यास बन के देख

देती है सुकूंन कितना यह कशिश मुहब्बत की
पुरानी इश्क की कोई ज़रा शराब बन के देख

सारी नेमतें एक ओर पर वो लम्हे इक तरफ
सुबह सुबह की आँखों की तू नींद बन के देख

दिन में देखे ख्वाब तो दिन में ही टूट जायेंगे
चमकते कहाँ जुगनू कभी तू रात बन के देख

तेरे आने से अब कहाँ कहाँ हो जाती है रौशनी
मेरे घर के आगन में तू आफताब बन के देख

मज़ा है डूबने का कुछ और ही इसमें “मिलन”
झील की गहराइयों सी एक शाम बन के देख

मिलन “मोनी”