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He Prabhu

13 Mar

हे प्रभु,
इस दास की
इतनी विनय सुन लिजिये,
मार ठोकर नाव मेरी
पार ही कर दीजिये !
मैं नहीं डरता,
प्रलय से,
मौत या तूफ़ान से,
रूह मेरी कांपती है,
बस सदा इम्तेहान से !

पाठ पढ़ना,
याद करना,
याद करके सोचना,
सोच कर लिखना उसे,
लिख कर उसे फिर घोटना,
टाय टाटा टाय टाटा
रोज़ रटता हूँ प्रभु,
रात दिन पुस्तकों के
पन्ने उलटता हूँ प्रभु,
किन्तु जाने भाग्य में
यह कौन सा अभिशाप है
रात भर रटता,
सुबह मैदान मिलता साफ़ है !

मेरे अभिन्न मित्र ने
सरल हल बतलाया,
हर विषय की पर्ची बनालो
मुझको यह समझाया,
पर इसमें तो मेरा,
बहुत समय लग जाएगा,
दो एक चिट बनाने से
क्या काम मेरा चल पायेगा,
चार सौ पन्नों की पुस्तक से
कितनी चिट बनाउंगा,
टीचर को गर पता लग गया
मार बहुत फिर खाउंगा,
कुछ डर डर कर
कुछ हिम्मत करके,
खुद को खींच लाया हूँ
इम्तेहान देने आया हूँ!

प्रभु तेरा हद से ज़्यादा
आशीष लेने आया हूँ,
कुछ तेरे वास्ते भी
भोग लगाने लाया हूँ,
दो आने का टीका चन्दन
चार आने का फूल प्रसाद,
बस इतनी ही लेकर घूस
कर देना मुझको पास !

पहला दिन इंग्लिश है
दूजा गणित और एलजेबरा,
तीजा इतिहास फिर भूगोल
पंचम संस्कृत फिर हिंदी,
जेल से छुट्टी मिलेगी हो जाएगा कल्यान,
और अंतिम दिन रहेगा सामान्य ज्ञान !

लेकिन हाल हुआ क्या मेरा
किस किस को बतलाऊं,
शहर के किस कोने में जाकर
अपना मुह छिपाऊं !

पी गयी इंग्लिश हमारे
खोपड़ी के खून को,
मैं समझ पाया नहीं
इस बेतुके मजमून को,
सी.यू.टी कट है तो पी.यु.टी पुट कैसे हो गया,
एस.ओ. सो है तो डी.ओ डू क्यों कर हो गया !
कौन सी स्पेल्लिंग सही है कौन सी गलत
इसकी क्या पहचान है,
नाइफ में न जाने ‘के’ कहाँ से आ गया
बस यही बात भेजा मेरा खा गया !

गणित के अतिरिक्त मुझे
और कुछ भाता नहीं,
पर क्या करूँ
गुणा करना मुझे आता नहीं,
हासिल लेलो हासिल देदो
भाग में यह क्या होता है,
सच पूछो तो आखिर कार
हासिल कुछ नहीं होता है !

अक्ल मेरी एलजेबरा जड़ से जाएगा पचा
तीन में से छह गए तो और क्या बाकी बचा,
क ख ग की ताल पर रचता सारा खेल
बाकी वर्ण माला क्या लेने गयी है तेल,
क का मान बताओ अगर
क ख ग का योग है पंद्रह,
सरल था उत्तर लिख दिया
क से कबूतर ख से खरगोश और ग से गधा !

नाश हो इतिहास का
सन के समुन्दर बह गए,
मर गए वो लोग और
रोने के लिए हम रह गए,
शाहजहाँ, अकबर, हुमायूं और बाबर आप थे
कौन थे बेटे न जाने कौन किसके बाप थे !

भूगोल में था प्रश्न आया
गोल है कैसे धरा,
एक पल में लिख दिया
मैंने तभी उत्तर खरा,
गोल है लड्डू,जलेबी और पापड़ गोल है
इसलिए मास्टर साहब ये धरा भी गोल है,
झूम उठे मास्टर साहब इस अनोखे ज्ञान से
और लिख दिया हमारी कॉपी पर ये शान से
ठीक है बेटा हमारी लेखनी भी गोल है,
गोल है दावात, नुम्बर भी तुम्हारा गोल है !

राम रामौ राम रामौ हाय प्यारी संस्कृतम
तू न आती मर गया मैं रच कच कचूमरम,
चंड खंडम चंड खंडम चट पट चपाचटम
चट रोटी पट दालम चट पट सफाचटम !

राष्ट्र भाषा हिंदी का हमको सम्मान है
इसने भी पर हमारा लिया इम्तेहान है,
पर्यायवाची शब्द जाने कहाँ से आ गए
एक शब्द के इतने रूप मेरा दिमाग खा गए !

सामान्य ज्ञान के प्रश्न तो होते हैं आसान
लेकिन उनके उत्तर ही ले लेते हैं जान,
सबसे छोटा सबसे बड़ा, सबसे लंबे का पंगा
सबसे ऊंची कंचन जंघा, सबसे लम्बी गंगा,
जब जनरल नोलिज की जगह
बस लिखा जर्नल नोलिज,
टीचर कर्नल ने बुलाकर पूछ लिया सवाल
पानीपत में कितनी बार हुआ था बबाल,
पानीपत का बहुत सुन रखा था नाम
रामायण और महाभारत का वहीँ हुआ था काम !

फिर पूछा अंग्रजी में स्पेल्लिंग बताओ
नोलिज और साइकोलोजी की वाट लगाओ,
हिंदी में फिर रटी रटाई स्पेल्लिंग बताई
नोलिज, कानउ लद गए
साईंकोलोजी, पिसाई का लोगी,
ये सुनते ही टीचर के होश हो गए गुम,
बेटा इस साल भी फेल हो जाओगे तुम !

आ गया तेरी शरण
अब ज़िन्दगी से हार कर,
मार थप्पड़, लात घुसे, पर मुझे तू पास कर !!

हे प्रभु,
इस दास की
इतनी विनय सुन लिगिये,
मार ठोकर नाव मेरी
पार ही कर दीजिये !!!

मिलन “मोनी” ११/३/२०१७

यह कविता लगभग १९६७-६८ में मेरे हाथ लगी थी, इसके मूल रचनाकार अज्ञात हैं, लेकिन इसकी रोचकता और हास्य दिल को छू लेने वाला है
इसके मूल रूप को यथावत रखते हुए कुछ आंशिक मनोरंजक बदलाव भी किये गए हैं,उम्मीद है पाठकों को यह मेरा संस्करण पसन्द आयेगा !!

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Mai Aur Tu

13 Feb

जीवन अनंत आनंद है
सागर मैं,और किनारा तू,
जीवन मिलन विछोह है
मुसाफिर मैं,सहारा तू !

जीवन चिर गतिमय है
रास्ता मैं, मंजिल तू,
जीवन गुलदस्ता है,
पुष्प मैं, खुशबू तू!

जीवन एक बहाव है
कश्ती मैं, नदिया तू,
जीवन सावन माह है
बादल मैं, बरखा तू!

जीवन एक दीवाली है
दीपक मैं, बाती तू,
जीवन उतार चढ़ाव है
पर्वत मैं, झरना तू!

जीवन स्वप्न सलोना है
नींदें मैं, सपना तू,
जीवन रैन बसेरा है
पंछी मैं, बसेरा तू !

जीवन एक उजाला है
सूरज मैं, लाली तू,
जीवन चाँद सितारा है
सवेरा मैं, सांझ तू !

जीवन महका महका है
माली मैं,बगीचा तू,
जीवन एक ज़ज्बात है
शायर मैं, कविता तू !

जीवन तो उन्माद है
सागर मैं, सुराही तू,
जीवन एक उम्मीद है
प्रयास मैं,आशा तू !

जीवन एक संरचना है
पुरुष मैं, नारी तू,
जीवन आर पार हैं,
बस मैं,और बस तू !!

मिलन “मोनी”

Milan

9 Feb

‘मिलन’ का मिलन
मुबारक हो तुझे
मैं जो मिलूँ तो एक
मिलन मिले तुझे
मिलन ही मिलन
है मुक्कद्दर में तेरे
हर मोड़ पर ‘मिलन’ का
मिलन मिले तुझे !

ज़मीं है और
आसमान है मिलन
प्रेम की चरम
सीमा है मिलन
मिलन ही मिलन
हर दिल में बसा
रब की परम
लीला है मिलन !!

‘मिलन’ की निगाहें
मिलन मांगतीं हैं
‘मिलन’ से मिलन की
दुआ मांगती हैं
मिलन ही मिलन है
जब ‘मिलन’ से मिलन हो,
जुदाई भी ‘मिलन’ से
मिलन मांगती है !!!

मिलन “मोनी” १९६५

Ishtehaar

24 Jan

शहर के हर
नुक्कड़
हर चौराहे पर
दफ्तरों की दीवारों पर
सभी सार्वजनिक स्थानों पर
कोठियों पर
सरकारी इमारतों पर
बाज़ारों और स्कूलों पर
यह इश्तेहार लगवा देना
के आदमी यहाँ कहीं
गुम हो गया है,
हिन्दू बहुत हैं
मुसलमान बहुत हैं
सिख हैं काफी
ईसाई बहुत हैं
पर इंसान नहीं मिल रहा
और इसलिए किसी समस्या का
हल नहीं मिल रहा
खोज कर लाने वाले को
उचित इनाम मिलेगा,
ये मेरा वादा है !!

मिलन “मोनी”

Bahut Aasaani Se

18 Jul

ढूंढना मुझे,
मिल जाउंगा
बहुत आसानी से !
संभालना मुझे
वरना
निकल जाउंगा
कहीं दूर
बहुत आसानी से !!१

सारे अपने
गिले शिकवे
भूल जाउंगा
बहुत आसानी से !
वरना
याद न आउंगा
किसी को
बहुत आसानी से !!२

दिल में बसा लेना
समा जाउंगा
बहुत आसानी से !
वरना
नज़र से ओझल
हो जाउंगा
बहुत आसानी से !!३

गुलाब हूँ
खिल जाउंगा
बहुत आसानी से !
तेरी जुल्फों में
सज जाउंगा
बहुत आसानी से !
सिर्फ नज़रों से
छूना मुझको
वरना
बिखर जाउंगा
बहुत आसानी से !!४

प्यार का एक
एहसास हूँ
निभाना मुझसे
वरना
खाक में
मिल जाउंगा
बहुत आसानी से !
चैन हूँ
किसी को
मिलता नहीं
बहुत आसानी से !!५

अगर चाहो तो
आजमाना
मिल न पाउँगा
बहुत आसानी से !
अश्क हूँ
पलकों से
बह जाउंगा
बहुत आसानी से !!६

नदी हूँ
निरंतर
बहता जाउंगा
बहुत आसानी से !
समुंदर में
आखिरकार
समा जाउंगा
बहुत आसानी से !!७

हवा हूँ
सुगंध बन कर
उड़ जाउंगा
बहुत आसानी से !
झूमते गाते
पत्तों से पूछ लेना
जब चाहें मेरा पता
बता देंगे तुझको
बहुत आसानी से !!८

आसमान हूँ
समा लेता हूँ
ये सूरज
ये चाँद
और सारे
सितारे
बहुत आसानी से !
वक़्त के साथ
मौसम के साथ
रंग बदल जाउंगा
बहुत आसानी से !!९

फिरभी
एक बार तो
ढूंढना मुझे,
मिल जाउंगा
बहुत आसानी से !!१०

Aate Aate

19 Apr

फिर क्यों?
ठहर गयी ये धूप,
मेरे आँगन
आते आते !

सिमट गयी ज़िन्दगी,
घोर तिमिर में,
कोई बाती तक,
काम न आई,

फिर क्यों ?
ठहर गयी ये बात,
लबों तक
आते आते !

उतर गयी,
मुस्कान,
होंठों की,
कोई ठिठोली,
रास न आई,

फिर क्यों ?
बिखरे हालात,
मेरे बश में,
आते आते !

मन का पंछी,
उड़ा शितिज तक,
दर्द गहरा,
पाताल सतह तक,
कोई विधा,
कोई दवा,
काम न आई,

फिर क्यों ?
उखड गयीं साँसे,
बात लबों तक,
आते आते !

दर्द का उपहार,
लेकर,
नयना रोये,
सांझ,
सवेरे,
बाहें तक तेरी,
काम न आयीं

फिर क्या ?
सपने खोये,
आशाएं खोयीं,
उम्मीदों की
राहें खोयीं,
अपने घर तक,
आते आते !!

Paani Ki Boond

11 Apr

पानी की बूँद
पलकों पे आ गई
बरसात,
एक बार फिर,
दागा दे गई

बारिश की जगह
सूखे पत्ते गिरे
दरख्तों से
बस उन हवाओं के
चलने से
जिन्होने उड़ा दिए
सारे बादल
और
एक सूखी सी चादर
खेतों को ढक गई
जिनकी मिटटी
फटने लगी
जगह जगह

किसानों के सीनों पे
चल गए हल
सपनों में
पड़ गईं
दरारें
पानी की धारा
आँखों से निकली
सीचती चली गयी
नई फसल
लाचारी की

बरसात,
एक बार फिर
दागा दे गई