Archive | April, 2016

Ajeeb Baat Hai

30 Apr

इंसान हो गया अजीब, अजीब बात हैं
देश अमीर जनता गरीब, अजीब बात है

पैदा करे अनाज वो, खाने को तरसे
खुद फांसी उनका नसीब, अजीब बात है

मैं आगे बढ़ कर भी, पीछे लौट आया
जो दोस्त हैं वही रकीब, अजीब बात है

खुशहाली का वादा कर, लूटे सबके घर
नेता गण फिरभी हबीब, अजीब बात है

पास रहकर भी रहती हैं दूरियां ‘मिलन’
जितने दूर उतने करीब, अजीब बात है

मिलन “मोनी”

Aas Pass

21 Apr

अब तक टूटी आस नहीं
बेशक कोई पास नहीं

तनहा लौट गया मैं
जहाँ तेरा साथ नहीं

बस प्रेम की धुन सुनी
और कोई साज़ नहीं

चेहरा वही चाँद सा
कोई दाग वाग नहीं

दिल में चुभा हुआ
दर्द कोई त्रास नहीं

जीना चाहते है सब
जिंदा कोई आस नहीं

बहर छोटी है बहुत
गज़ल कोई ख़ास नहीं

‘मिलन’ चाहते हैं हम
रास्ता कोई रास नहीं !

आस है कोई पास नहीं
कोई आस पास नहीं !!

मिलन “मोनी”

Yuh Hi

20 Apr

पलकों के पीछे सपने,पलते नहीं हैं यूँ ही,
दिल से दिल के रिश्ते,मिलते नहीं हैं यूँ ही,

स्पर्श प्यार का मखमली होता हीहै ऐसा
गाल शर्म से गुलाबी,खिलते नहीं हैं यूँ ही,

बाहें खुली हुई मेरी मोहब्ब्त का असर हो,
होंठों पर गीत पुराने,उभरते नहीं हैं यूँ ही,

खुदा का शुक्रिया ये उजाला मुझे दिया है
चराग कोई तूफ़ान में,जलते नहीं हैं यूँ ही

तनमन तेरा हरदम अब तो खिला रहता है,
लम्हे मधुर ‘मिलन’के सजते नहीं है यूँ ही,

पलकों के पीछे सपने,पलते नहीं हैं यूँ ही,
दिल से दिल के रिश्ते,बनते नहीं हैं यूँ ही,

‘मिलन’ ७/८/२०१५.कविता (यूँही) से

Aate Aate

19 Apr

फिर क्यों?
ठहर गयी ये धूप,
मेरे आँगन
आते आते !

सिमट गयी ज़िन्दगी,
घोर तिमिर में,
कोई बाती तक,
काम न आई,

फिर क्यों ?
ठहर गयी ये बात,
लबों तक
आते आते !

उतर गयी,
मुस्कान,
होंठों की,
कोई ठिठोली,
रास न आई,

फिर क्यों ?
बिखरे हालात,
मेरे बश में,
आते आते !

मन का पंछी,
उड़ा शितिज तक,
दर्द गहरा,
पाताल सतह तक,
कोई विधा,
कोई दवा,
काम न आई,

फिर क्यों ?
उखड गयीं साँसे,
बात लबों तक,
आते आते !

दर्द का उपहार,
लेकर,
नयना रोये,
सांझ,
सवेरे,
बाहें तक तेरी,
काम न आयीं

फिर क्या ?
सपने खोये,
आशाएं खोयीं,
उम्मीदों की
राहें खोयीं,
अपने घर तक,
आते आते !!

Dard Apna Hai

14 Apr

दर्द अपना ही है इसको दिल में बसाया जाए
अपने साये कोही अपना हमराज़ बनाया जाए

बन्द कमरे की घुटन से बचने के लिए सही
बाहर दीवार में एक रोशन दान बनाया जाए

कैसी हवाएँ चल रहीं हैं गलियों में आज कल
मुंडेरों पर जला दीपक रख पता लगाया जाए

उनके जाने से इस शहर में बहुत कुछ बदला
ये कितना छुपाया और कितना बताया जाए

मकां के कोनेकोने में उनकी यादें हैं बावस्ता
किसे मिटाया या किससे दिल सजाया जाए

जिन खतों में उसने रख गुलाब भेजे ‘मिलन’
उनकी खुशबू सेही अपना घर महकाया जाए

मिलन “मोनी” १४/४/२०१६

Shavaab Dekha

12 Apr

क़यामत सा गुलों पर शवाब देखा
हर चेहरे पर एक नया नकाब देखा

रातभर अंधेरों से घिरे घिरे रहे हम
सुबह से ही यह मौसम खराब देखा

फूलों से तो सभी ने की है मोहब्ब्त
हमने काँटों पे आते हुए अज़ाब देखा

अपने ही शहर के बगीचे में टहलते
डाल से टूटते एक सुर्ख गुलाब देखा

पतझड़ से बदलते मौसम पर हमने
ज़मीं पर उगाते हुए आफताब देखा

खामोशियों की खिडकियों से ताकते
आँखों ने फिर नया एक ख्वाब देखा

कई तंज़ सहे अपने हालात पे’मिलन’
दुश्मनों का भी दिल-ऐ-अहबाब देखा

मिलन “मोनी” १२/४/२०१६

Paani Ki Boond

11 Apr

पानी की बूँद
पलकों पे आ गई
बरसात,
एक बार फिर,
दागा दे गई

बारिश की जगह
सूखे पत्ते गिरे
दरख्तों से
बस उन हवाओं के
चलने से
जिन्होने उड़ा दिए
सारे बादल
और
एक सूखी सी चादर
खेतों को ढक गई
जिनकी मिटटी
फटने लगी
जगह जगह

किसानों के सीनों पे
चल गए हल
सपनों में
पड़ गईं
दरारें
पानी की धारा
आँखों से निकली
सीचती चली गयी
नई फसल
लाचारी की

बरसात,
एक बार फिर
दागा दे गई