Archive | October, 2012

Pyar Ki Dor

30 Oct

प्यार की डोर 

कभी ये प्यार की डोर अपनी टूट ना जाये कहीं,

सुबह की ये धूप आंगन से निकल ना जाये कही.

माना सुकून मिलता है इश्क मे मर जाने से भी,

बेवजह जिंदगी मे कुछ का कुछ हो ना जाये कही.

     नजदीकियां भी रुला देती हैं रिश्तों को कभीं कभी,

मुस्कुराते हुए आंख से आंसू छलक ना जाएँ कहीं.

मै तो हूं एक पथिक कुछ देर ठहर कर चल दूंगा

बात अब दिल की दिल ही मे रह ना जाये कही,

जो भी कहना है कह लो इस ही वक़्त ‘मिलन’

देखते देखते ये उम्र प्यासी गुज़र ना जाये कही.

कभी ये प्यार की डोर अपनी टूट ना जाये कहीं ,

सुबह की ये धूप आंगन से निकल ना जाये कही,

उनकी बाहों मे ही मेरा दम निकल ना जाय कही

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Hua Nahi Tha

26 Oct

हुआ नहीं था

प्यार किसीसे इतना, जब तक हुआ नहीं था,

दिल बेकरार इतना, तब तक हुआ नहीं था.

रातों मे ख्वाब तेरे अब आ कर जगा रहें हैं,

सपना यह होगा सच्चा, पहले लगा नहीं था.

एक दीवानगी सी जैसे छाने लगी है मुझपर,

मेरा दिल किसी ने ऐसे, पहले छुआ नहीं था.

इन तन्हाइयों मे अक्सर, बातें करीं हैं तुमसे,

नज़रों से तुमने कुछ भी, पहले कहा नहीं था.

हारा हूं आजतक जो, वो लगता है जीत मेरी,

खुशियों का ऐसा मेला, पहले लगा नहीं था.

प्यार किसीसे इतना, जब तक हुआ नहीं था,

दिल बेकरार इतना, तब तक हुआ नहीं था.

मिलन ……..२००४

Insaan Ki Tarha

21 Oct

  इंसान की तरह

बांसों के जंगल मे लगी, आग की तरह,

खुद आदमी है आस्तीने, साँप की तरह.

किसपे करें भरोसा ओ किसपे करें यकीं,

चेहरे बदल रहे हैं लोग, पोशाक की तरह.

उड़ नहीं पातीं यहाँ पतंगें, अब प्यार की,

चलती है हवा जब एक, तूफ़ान की तरह.

मजलूम हो गया अब आदमी इस कदर,

के झुक गयी है जिंदगी, बीमार की तरह.

सोचता होगा यह खुदा, भी कभी कभी,

इंसान कब रहेगा एक, इंसान की तरह.

बांसों के जंगल मे लगी आग की तरह,

खुद आदमी है आस्तीने साँप की तरह.

मिलन……..२००४.

Saanso Ka Rishta

19 Oct

साँसों का रिश्ता

 

खनक प्यार की, तेरे दिल तक, पहुँच सकी या अभी नहीं,

नयनों से नयनों की भाषा तुम, समझ सकी या अभी नहीं.

कितनें ही फूल किताबो मे रख कर, हमनें तुमको भेजें हैं,

सुगन्ध प्यार की मन तुम्हारा, महका सकी या अभी नहीं,

मेरे गीत ओ ग़ज़ल तुमने कभी, जाने अन्जाने सुने होंगे,

धुन प्यार की तुम्हारे मन तक, पहुच सकी या अभी नहीं.

लम्स तेरे हाथों का हरवक्त, होता है अब महसूस मुझे तो,

अवलोकन मेरे अहसासों का, तुम कर सकी या अभी नहीं.

मेरे ह्रदय के स्वर तुम तक, कभी न कभी तो पहुंचे होंगे,

साँसों से साँसों का रिश्ता, तुम समझ सकी या अभी नहीं.

खनक प्यार की, तेरे दिल तक, पहुँच सकी या अभी नहीं,

नयनों से नयनों की भाषा तुम, समझ सकी या अभी नहीं

मिलन……..२००४.

Raat Dhalti Hi Rahi

18 Oct

रात ढलती ही रही

हो सकी जब न सहर,

रात ढलती ही रही,

पास आने की तेरे,

चाह बढती ही रही,

हो सकी………..

जो कभी छलका नहीं,

मै वो एक सागर हूं,

तेरी आँखों ही मे डूबा,

में वो एक शायर हूं,

प्यास होठों की बढ़ी,

और बढती ही रही,

पास आने की……..

अब चलें दूर कहीं ,

और जहाँ कोई नहीं,

साथ चलने को जहाँ,

कोई साया भी नहीं,

में संभलता ही रहा,

राह बदलती ही रही,

पास आने की ……..

हुस्न की बहकी हुई,

एक शरारत है तू,

प्यार से महकी हुई,

एक इबादत है तू,

सेज ख्वाबों की सजी,

और सजती ही रही,

पास आने की ……..

जब जुनू जागता है,

तड़प के रह जाता हूं,

अपनी तन्हाई मे ही,

सिमट के रह जाता हूं,

जख्म भरते भी रहे,

चोट लगती भी रही,

पास आने की ……..

हो सकी जब न सहर,

रात ढलती ही रही,

पास आने की तेरे,

चाह बढती ही रही,

मिलन……१९७१.

Tez Hawa Ke Jhonke

17 Oct

तेज़ हवा के झोंके

तेज़ हवा के झोंके आये,

जब जब हमने दीप जलाए,

ख़ामोशी तेरे नैनो की,

जाने कितना कुछ कह जाए.

तेज़ हवा के……..

किसको यह मालूम नहीं है,

कितना नाज़ुक दिल होता है,

इसको अपने वश मे रखना,

भी कितना मुश्किल होता है,

पल भर मे जुड़ जाना इसका,

पल भर मे ये टूट भी जाए.(१).

तेज़ हवा के ……………….

रिश्तों की कोई उम्र नहीं है,

कल जो साथ था आज नहीं है,

कच्चे धागों का यह बंधन,

जनम जनम का साथ कहीं है,

हाथों मे आते आते अब,

हाथ हमारा छूट ना जाए.(२).

तेज़ हवा के …………….

हमने चाहा तुमको सारा,

अपने दिल का हाल बताएं,

कैसे काटीं ये तनहा रातें,

कैसे तनहा दिन हैं बिताये,

सुख दुःख दो ही हैं किनारे,

लहर जिधर चाहें ले जायें.(३ ).

तेज़ हवा के ………………

जीना कितना मुश्किल होता,

एक जो तेरा साथ ना होता,

वीराने इन रस्तों पर कोई,

अपने दिल का मीत ना होता,

खुद को ही हम ना पहचानें,

तनहा इतना रह ना जायें.(४).

तेज़ हवा के ………………

तेज़ हवा के झोंके आये,

जब जब हमने दीप जलाए ,

ख़ामोशी तेरे नैनो की,

जाने कितना कुछ कह जाए.

मिलन……२००४

Justju

17 Oct

जुस्तजू 

फूलों की जुस्तजू मे, इतना हमें करना पड़ा ,

पाँव कांटो पर रख कर, दूर तक चलना पड़ा.

जितनी हुयीं ये पूरी, उतनी बढती चली गयीं,

कुछ ख्वाइशों को बस, दिल मे ही रखना पड़ा.

गहरी झील के पानी की तरह,वो तो ठहरे रहे,

दरिया बन, हमे बहुत दूर तक निकलना पड़ा.

थोड़े से ही उजालों की उम्मीद मे हमको यहाँ,

चरागों की ही तरह रात रात भर जलना पड़ा.

कोई महफूज़ घर नहीं मिलता, अब ज़मीं पर,

रिश्ता आसमां से अपना, बना के रखना पड़ा.

फूलों की जुस्तजू मे, इतना हमें करना पड़ा ,

पाँव कांटो पर रख कर, दूर तक चलना पड़ा.

मिलन …..२००४