Archive | April, 2018

Pyaas Bujhao Zara

25 Apr

कोई प्यासे को पानी पिलाओ ज़रा
प्यार से प्यास अपनी बुझाओ ज़रा !

रात रात याद सताती रही आपकी
ख़्वाब में ही सही पर बुलाओ ज़रा !

रस्ते में ख़ुशी हो या हो चाहें ग़म
राह मंजिल की कोई सुझाओ जरा !

जब चाहो नया जाम मिल जाएगा
मयकशी की हद मुझे बताओ ज़रा !

भूलते जारहे जुबां तहजीब की हम
आदमी को तो इंसान बनाओ ज़रा !

सूखे शजर भी फूलों से भर जायेंगे
सपने बहारों के कोई सजाओ ज़रा !

डूब कर भी किनारा नज़र आयेगा
तुम लहर को गले से लगाओ ज़रा !

खोया है’मिलन’इन आँखों में तेरी
उसको अपना पता अब बताओ ज़रा !!

मिलन “मोनी”

Advertisements

Tabeeb

17 Apr

मरीज़े-इश्क देख देख इश्के-मरीज़ हुआ जाता हूँ
तबीब हूँ तबियते नासाज के करीब हुआ जाता हूँ !

नाम मुकाम दौलत शोहरत सब कुछ है मेरे पास
लेकिन अपने दिल के चलते गरीब हुआ जाता हूँ !

मतला मक्ता और कुछ शेर क्या कहने लगे हम
आज ज़िन्दगी की ग़ज़ल का रदीफ़ हुआ जाता हूँ !

करी है मैंने आज तलक तो बहुत मुक़द्दस शायरी
पर तेरे इश्क की खातिर बद-शरीफ हुआ जाता हूँ !

देखते हैं दोस्तयार मुझे आज भी जिस निगाह से
अपने आप से ही कभी कभी अजीब हुआ जाता हूँ !

अब लोग मुझे आशिक-दीवाना कहते हैं ‘मिलन’
और मैं हूँ के जैसे लकीर का फकीर हुआ जाता हूँ !!

मिलन “मोनी”

Vishvaas

3 Apr

मेरी मोहब्बत का एहसास करके देखो
मेरे विशवास पर विशवास करके देखो !

लुत्फ़ मयकशी का बहुत आयगा तुम्हें
अगर तन्हायी गले का हार करके देखो !

हर क़दम पर मिलेगी एक नयी रौशनी
सरल ज़िन्दगी का अन्दाज़ करके देखो !

लौट करके आयगा वापस तुम्हारे पास
पिंजरे से परिंदे को आज़ाद करके देखो !

दिल की बात ये चेहरा पढ़कर बता देंगे
इन अयनों से जान पहचान करके देखो !

जो चाहोगे तुम सब ही मिल ही जाएगा
कभी आम आदमी को ख़ास करके देखो !

दिल की बात तेरी समझता है ‘मिलन’
जहन को अपने जरा साफ़ करके देखो !!

मिलन ” मोनी ” ३/४/२०१८

Nayi Purani Kameez

3 Apr

कभी यह पुरानी कमीज़ कमाल कर जाती है
नयी कमीज़ पर कई यादें उधार कर जाती है !

नयी कमीज़ ने पुरानी कमीज़ पर तंज़ किया
मेरे आ भर जाने से तेरी गुज़र उमर जाती है !

सुनकर यह बात पुरानी कमीज़ ने चुटकी ली
तुझे पहनने से पहले तो रूह तक डर जाती है !

नयी कमीज़ में वो कोरे बदन की खुशबू कहाँ
पुरानी कमीज़ की जो साँसों में उतर जाती है !

नयी कमीज़ तुझमें वो सिलवटें मिलतीं नहीं
जो प्यार से छू छू के सजनी दूर कर जाती हैं !

नयी कमीज़ तुझ पर होठों के वो निशाँ नहीं
जिन्हें ये प्रियत्मा यादगार बना कर जाती है !

तेरे कॉलर पर उमर की काली वो लकीरें कहाँ
जो कई बार धोने पर भी न छोड़ कर जाती हैं !

मुझे पहन के कामयाबी की कई सीढ़ियाँ चढ़ी
कभी ये नयी वाली सब गुड़ गोबर कर जाती है !

कितने ही नसीबवर लम्हों पर इस्तेमाल किया
वो कमीज़ अब भी मुक़द्दर कायल कर जाती है !

आज जब जगह जगह से उधड गई है ‘मिलन’
नयी कमीज़ फिर से नयी उम्मीदें भर जाती है !!

मिलन “मोनी”