Archive | January, 2015

Chidiya

26 Jan
सोने की चिड़िया, 
एक रंग बिरंगी, आकर्षक,
बहुत निराली थी चिड़िया,
तिनका तिनका तोड़ जोड़ कर,
रहने आई थी चिड़िया,
बड़े वृक्ष की ऊंची शाख पर,
छोटा अपना घर बना कर,
स्नेह प्रेम का रंग लगा कर,
धर्म कर्म के पंख सजा कर,
खुद पर भी विश्वास  बना कर,
बसने आई थी चिड़िया,
रंग अनोखा, रूप सलोना,
अपना एक परिवार रचा कर,
दाना दाना चुन चुना कर,
महनत पर विशवास जाता कर,
उन्मुक्त भाव से,निर्भय होकर,
गीत सुनती थी चिड़िया,
सावन की बौछारों को रिमझिम,
प्रणय रस से रच देती थी
हर मौसम को एक पर्व सा,
रोमांचित सा कर देती थी
कली कली और फूल फूल को,
महका देती थी चिड़िया,
सूरज से लाली ले ले कर,
चंदा की शीतलता ले कर के,
सरोवर से पावन जल कण लेके,
अपना संसार चलती थी,
धरती और आकाश में कुछ,
फर्क नहीं करती थी चिड़िया,
जीवन को नए उम्मीदों के,
स्वप्न दिखाती थी चिड़िया,
हर सुबह को नए स्वरों से,
सजा देती थी चिड़िया,
पता नहीं,
कब पंख लगे,
कब फुर्र करके उड़ गयी चिड़िया,
कहते हैं के देश हमारा,
था कभी, सोने की चिड़िया,
नहीं चाहिए चांदी, सोना,
नहीं चाहिए,राज खजाना,
अब दिल करता है,
बस निर्भय होकर,उसी तरह,
उस ही डाल पर,किसी तरह,
फिर से लौट आए चिड़िया,
नयी चेतना,नई उमंग से,
वैसा ही आनन्दमय,
नया घर बनाय चिड़िया.
दिशा हीन हो रहे ख्यालों को,
फिर दिशा दिखाए चिड़िया,
एक रंग बिरंगी, आकर्षक,
बहुत निराली थी चिड़िया,
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Tum Nahi Toh

8 Jan

तुम नहीं तो यह मौसम-ऐ-बहार कुछ भी नहीं,
तेरे शवाब के आगे गुलो-गुलज़ार कुछ भी नहीं.

चांदनी रातें और सितारों की यह झिलमिलाहट,
तेरी यादें नहीं तो यह शबे बारात कुछ भी नहीं.

जूनून-ऐ-इश्क है, जूनून-ऐ-शौक भी है ज़िन्दगी,
दीदारे-हुस्ने नहीं,तो ये जूनूने-हयात कुछ भी नहीं.

तेरी खुशबू से महकते हैं, सारे गुल-ओ-गुलशन,
तेरे ख्वाबों के आगे,यह ज़ौके-रंग कुछ भी नहीं.

नज़रें मिलाते ही तेरा,यूँ हया से लाल हो जाना,
फिर मुस्कुरा कर कहना, यह अदा कुछ भी नहीं.

कर गया बरहम दिले सुकूं को, शर्माना आपका,
और आँखें झुका के कहना राज़ेदिल कुछ भी नहीं.

गुफ्तगू मोहब्बत की क्या,इस सादगी से होती है,
मुद्दतों बात दिल की करें,और बात कुछ भी नहीं.

चूम कर उनके होंठों को, महसूस किया है मैंने,
इस मयकदे के आगे,बोतले शराब कुछ भी नहीं.

तुम नहीं तो यह मौसम-ऐ-बहार कुछ भी नहीं,
तेरे शवाब के आगे गुलो-गुलज़ार कुछ भी नहीं.

मिलन “मोनी”