Archive | February, 2013

mareez-e-ishq

22 Feb

मरीज़-ऐ-इश्क

चाहें दूर हों जितना, बेहद करीब लगते हैं,

रूठ जाएँ तो बहुत, दिल नशीन लगते हैं.

कर देता है ज़ख़्मी, हर वार उनका मुझको,

तंज़ नज़र के दिल पर बड़े सटीक लगते हैं.

कभी होता है उनके इंतज़ार का आलम तो.

दिन छोटे भी हों पर बहुत तवील लगते हैं.

चर्चे उनके शहर शहर अब इतने हो गए हैं,

अब हम तो बस लकीर के फ़कीर लगते हैं.

गमे-सबब हैं वो, और गमे-इलाज भी वही,

इसीलिए हम शायद उनके मरीज़ लगते हैं.

Sharma Jaati Hai Woh

5 Feb

शर्मा जाती है वो 

कुछ न कहो तो घबरा जाती है वो,

कुछ कहो तो बस शर्मा जाती है वो.

ये नहीं के वो कुछ भी समझती नहीं,

पर नादान बनके दिल तरसाती है वो.

चाँद सा चेहरा और लब पंखुड़ी गुलाब,

घनी जुल्फों में गज़ब की लगती है वो.

उस लम्हे क़यामत गिरती है दिल पर,

दांतों में दबा के ऊँगली इतराती है वो.

आँखों ही आँखों में हर बात करती है,

पर जुबान पर लाने से कतराती है वो.

कुछ न कहो तो घबरा जाती है वो,

कुछ कहो तो बस शर्मा जाती है वो.

Kaheen Kaheen

1 Feb

कहीं कहीं 

शम्मा से घर में आग, लगी है कहीं कहीं,

ऐसी हवा भी चमन में चली है कहीं कहीं.

झीलों ने बुझाई है होठो की प्यास अक्सर,

समुंदर तक पड़ गया है छोटा कहीं कहीं.

तेज़ धडकनों से भी कुछ कहा नहीं गया,

खामोशियाँ तक गुनगुना उठी हैं कहीं कहीं.

ठहरती नहीं महक बस गुलशन-ऐ-बहार में,

सेहरा में खिल गएँ हैं अब फूल कहीं कहीं.

उनकी भलाई के लिए जो भी कही गयी,

बातें वो भी दिलों पर लगी हैं कहीं कहीं.

शम्मा से घर में आग, लगी है कहीं कहीं,

ऐसी हवा भी चमन में चली है कहीं कही.