Archive | July, 2015

Nahi Jaane Deta

31 Jul

दिल की कहूं,तो दिल से नहीं जाने देता,
मैं दूर तुमको,निगाहों से नहीं जाते देता,

अक्स तेरा रहता साथ है, हमेशा की तरह,
ख्वाब में हो तो, ख्वाबों से नहीं जाने देता,

तेरे होंठों पर रहता हूँ मैं, नगमों की तरह,
तन्हाईयों में भी तुझे,तन्हा नहीं होने देता,

मेरे इश्क के आसमान का तो,चाँद हो तुम,
तेरा हुस्न कभी, बादलों में नहीं जाने देता,

मेरे वजूद में शामिल है, इस तरह ‘मिलन’
अपनी साँसों से तेरी, खुशबू नहीं जाने देता.

दिल की कहूं,तो दिल से नहीं जाने देता,
मैं दूर तुमको,निगाहों से नहीं जाते देता,

Apne Siva

31 Jul

अपने सिवा

इंसान अब इंसान को जोड़ता नहीं,
अपने सिवा और कुछ सोचता नहीं.

रिश्ते निभाना बोझ हो गया जिन्हें,
कोई प्यार के तराजू में तोलता नहीं

दोस्ती औ दुश्मनी में फर्क इतना है,
एक पलमें तोड़ता, एक छोड़ता नहीं.

शोर बहुत है दिल के अंदर ही अंदर,
पर जुबान से कोई कुछ बोलता नहीं.

पहुँच जाते हैं जो खुदी की बुलंदी पर,
कदम वो रास्तों से कोई मोड़ता नहीं,

इश्क में वादे निभाना आसाँ नहीं,
फलक से सितारे कोई तोड़ता नहीं.

इंसान अब इंसान को जोड़ता नहीं,
अपने सिवा और कुछ सोचता नहीं.

To Achha Tha

30 Jul

मैं खामोशी में कुछ लम्हे, बिता लेता तो अच्छा था,
तेरे दिल की धड़कन को, जो पढ़ लेता तो अच्छा था,

मुझे मालूम था तुमको, के फलक की आस ही होगी,
मैं पलकों पर सितारे कुछ, सजा लेता तो अच्छा था,
………………..तेरे दिल की धड़कन को, जो पढ़ लेता तो अच्छा था,

हमारे प्यार की कश्ती, भवर में डूब ना जाती,
मैं दरिया ही इस घर से, बहा देता तो अच्छा था,
………………..तेरे दिल की धड़कन को, जो पढ़ लेता तो अच्छा था,

बंजर इन ज़मीनों पर उगाने पड़े जो कुछ रिश्ते,
मैं क्यारी मोहब्बतों की, बना देता तो अच्छा था,
………………..तेरे दिल की धड़कन को, जो पढ़ लेता तो अच्छा था,

मैं खामोशी में कुछ लम्हे, बिता लेता तो अच्छा था,
में तेरे दिल की धड़कन को, जो पढ़ लेता तो अच्छा था.

“मिलन” ३०/७/२०१५

Maykadon Me

30 Jul

मयकदों में दिन-रात बस यही बात हुई है,
सुबहोशाम ग़म से जो मेरी मुलाकात हुई है,

वो परेशां रहें तो चैन, हमे भी नहीं मिलता,
हालत मेरी यूँ ही तो नहीं, बदहवास हुई है,

किस ग़म के लिए कितनी है मुनासिब शराब,
पैमानों से इस ही बात पर तो तकरार हुई है,

गमें दिल से मिटा देती है यह गमो के निशाँ,
दीवानों में ये इसलिए इतनी मशहूर हुई है,

जब तक कदम न लडखडाये पीने से फायदा,
रिन्दों को तभी इससे मोहब्ब्त बेहिसाब हुई है.

शराब अच्छी है या बुरी इसका फैसला करे,
कभी दवा तो कभी दारु से पहचान हुई है,

मयकदों में दिन-रात बस यही बात हुई है,
सुबहोशाम ग़म से जो मेरी मुलाकात हुई है.

Mera Kya ?

29 Jul

मेरा क्या ?

दर्द,
मेरे साथ ही पला,
एक ही पालने में झूला झूले,
एक ही बिस्तर पर सोए,
एक साथ खेले,
कई खिलौनों को तोडा,
साथ रोये,
साथ हँसे,
साथ साथ बड़े हुए,
अब तक साथ हैं.

एक बार मैं,
आम के पेड़ पर चढ़ गया,
आम तोड़े,
आम खाए,
कुछ मीठे,
कुछ खट्टे,
माली के डंडे की आवाज़ सुनी,
डर कर,
कूद पड़े,
पैर की हड्डी तुडवाई,
कोई नहीं आया,
वो ही मुझे,
किसी तरह,
घिसता घिसता कर,
घर तक ले कर आया,
अहसान तक नहीं माना,

वो चुलबुला था,
मैं शरारती,
खूब लुक्का छुप्पी खेलते थे,
मैं जहाँ भी छुपता,
वो खोज लेता था,
वो हरदम जीत जाता था,
मैं हारता ही था,
फिर रोता भी था,
वो ही मेरे आँसू,
पोछ देता था,
हौसला देता,
अगली बार जीत का,
आश्वासन देता,
सो मैंने हर परीक्षा उत्तीर्ण की,
बस हारा तो उसही से हारा,

एक बार,
जब मैं बीमार पड़ा,
वो मेरे सिरहाने बैठा रहा,
ठंडी पट्टियाँ रखता रहा,
मैं कहराना चाहता था,
मगर घुट गयी आवाज़,
कौन सुनता,
इस वक़्त,
मेरे जज़्बात,
सभी तो गहरी नींद में होंगे,
बस वो जागता रहा,
जब तक मैं,
सोया नहीं.

मेरी नाकाम मोहब्ब्त के चर्चे,
सारे शहर में थे,
मेरा मन,
ज़िन्दगी से,
उचाट रहने लगा,
मरना तक चाहा,
मगर उसने ही रोक दिया,
और मुझपर,
नज़र रखने लगा,
शायद उसे,
मेरे इरादों पर शक था,
इसके बाद,
वह कभी,
दूर नहीं गया,
और,
मेरे कमरे में ही,
रहने आ गया,

बचपन से जवानी,
जवानी से बुढ़ापा,
इतना ही सफ़र था मेरा,
लेकिन वो,
हमेशा की तरह,
चंचल,
चपल,
चुलबुला,
और जवान था,
न चेहरे पर झुर्रियां,
न आवाज़ में झुनझुनाहट,
न कभी कोई रोग,
पता नहीं,
किस मिटटी का बना है,
न मौसम का असर,
न वक़्त की मार,
न समय की पाबंदी,
कितना बिंदास है वो,

कई घर हैं उसके,
वह जहाँ जी चाहे,
रह सकता है,
सब जानते हैं उसे,
पर कोई पहचानता नहीं,
उसका चेहरा,
कोई देख नहीं सका आज तक,
एक मैं ही था,
जो उसे बहुत करीब से जानता था,
पहचानता था,
शायद,
अचानक किसी रोज़,
आयने में देख लिया था,
आकस्मात.

एक बार जब,
बेतहाशा,
बारिश हुई थी,
टूट पड़ा था आकाश,
मेरे घर की,
ईंट ईंट बिखर गयी थीं,
सारे अपने,
छोड़ गए थे साथ,
तब,
उसने ही,
मुझे बिखरने से बचाया था,
एक एक ईंट ,
जोड़ जोड़ कर,
मेरा घर बनाया था,
और मुझे,
नए सिरे से दोबारा,
बसाया था,
नहीं तो शायद,
हम बह गए होते,
आसुओं की तरह.

कभी कभी,
वह दबे पाँव,
मेरे पीछे आ जाता,
और मेरी आँखों पे हाथ रख,
पूछता,
बूझो मैं कौन हूँ,
नटखट कहीं का,
मैं,
उसकी साँसों की आवाज़ से,
पहचान लेता था,
फिरभी,
अंजान बना रहता था,
जान बूझ कर हार जाता था,
आखिर,
उसे जीतने की आदत जो थी,
मेरा क्या,
मेरा क्या?

Meharbaani Karta hun

29 Jul

मैं आज भी उन पर महरबानी करता हूँ,
मैं अपने गमो से पूरी बफादारी करता हूँ,

लहजा मेरा आज भी बदला नहीं है ज़रा,
बिंदास अपने आपसे अदाकारी करता हूँ,

निकल गए बहुत आगे इस ज़िन्दगी में,
मैं जिन ज़ख्मों से इमानदारी करता हूँ,

चुभें जब फूल तो काँटों से क्या उम्मीद,
मैं दोनों की ख़ुशी से तीमारदारी करता हूँ,

कोई मेरे नज़दीक आए तो समझे शायद,
मैं किस तरह दर्द की तर्ज़ुबानी करता हूँ,

मैं आज भी उन पर महरबानी करता हूँ,
मैं अपने गमो से पूरी बफादारी करता हूँ,

Ushi Se Hui

29 Jul

मोहब्ब्त भी हुई, तो उसी से हुई,
अदावत भी हुई तो, उसी से हुई,

जिनकी दोस्ती पर नाज़ था हमें,
शिकस्त भी हुई तो, उसी से हुई,

जान की बाज़ी लगा दी इशारे पर,
शिकायत भी हुई तो, उसी से हुई,

मेरे साये की तरह चल रहा साथ,
तन्हाईयां भी हुई तो, उसी से हुई.

शोहरत मेरी जिनसे बावस्ता रही,
रुस्वाइयाँ भी हुईं तो, उसी से हुई.

सरे बिस्तरे मार्ग पर जाते जाते,
मुलाक़ात भी हुई तो, उसी से हुई,

मोहब्ब्त भी हुई, तो उसी से हुई,
अदावत भी हुई तो, उसी से हुई,