Archive | March, 2016

Naye Imtehan Me

29 Mar

हर क़दम पे है ज़िन्दगी नए इम्तेहान में
कौन आगे निकल गया इस इम्तेहान में

न तुमने कुछ कहा न ही तुमने कुछ सुना
रात तो सारी गुज़र गयी बस इम्तेहान में

अपना खंजर कब किसकी पीठ पर लगाऊं
सियासत सारी लगी हुयी इस इम्तेहान में

कभी वर्षा कभी सर्दी कभी गरमी बेइन्तहा
हर मौसम डालता है इक नए इम्तेहान में

जिससे की दुश्मनी उससे ही की मोहब्ब्त
हरेक रिश्ता है आज कल बस इम्तेहान में

इंसान की मानूँ या भगवान् से दुआ मांगूं
किसान ने फांसी लगाली इस इम्तेहान में

कल गांधी थे बेहतर या आज मोदी अच्छे
सारा भारत भटक रहा है इसी इम्तेहान में

रौशनी देनी थी मुझको तूफानों में ‘मिलन’
बुझ बुझ कर जलता रहा इस इम्तेहान में

२९/३/२०१६ मिलन ‘मोनी’

Kabhi Nahi Nikle

25 Mar

कुछ अपने ही थे जो अपने कभी नहीं निकले
कुछ फूल चुभे दिल में जो कभी नहीं निकले.

खूब भटके हम अपने ही कमरों के अंधेरों में
जिधर रास्ता था बस उधर कभी नहीं निकले.

नही कह कर भी बन जाती है,बात अचानक
नतीजे जिन्हें कह कह कर कभी नहीं निकले.

ज़िन्दगी की धूप को आजमाया तो ये जाना
साए दरख्तों के हम साये कभी नहीं निकले.

अब अश्कों ने भी साथ आँखों का छोड़ दिया
ये अरमान थे दिल के जो कभी नहीं निकले,

ये किस भीड़ में गुम है अपना वजूद “मिलन”
भरी सड़क पर जबकी हम कभी नहीं निकले.

कुछ अपने ही थे जो अपने कभी नहीं निकले
कुछ फूल चुभे दिल में जो कभी नहीं निकले.

मिलन “मोनी”