Archive | August, 2014

Sukoon-e-Dil

22 Aug
क़यामत के वक़्त फिर, आकर मिला मुझसे.
बहुत देर तक वो जुदा, नहीं रह सका मुझसे.
 
मेरे दिल से ज्यादा महफूज़, जगह नहीं मिली,
उसकी यादों ने ये अहसास दिला दिया मुझको.
 
गिर गए दरख्तों से जब टूट कर वो घने साए,
कड़ी धूप का तब जुड़ गया सिलसिला मुझसे.
 
बहती हुई नदी का शायद वो दूसरा किनारा था,
जो साथ था पर साथ कभी नहीं मिला मुझसे.
 
इसके पहले के यह लकीरें कुछ कहतीं अपनी,
अपने हाथों को ही काट कर छुपा लिया मुझसे.
 
सुकून मिल ही जाता अगर थोडा सुकून रखते,
रफ्तारे ज़िन्दगी ने कुछ दिया न लिया मुझसे.
 
क़यामत के वक़्त फिर, आकर मिला मुझसे.
बहुत देर तक वो जुदा, नहीं रह सका मुझसे.

मिलन ‘मोनी’

 
 

Milan Ki Raat Me

15 Aug
रंग भरो न ! जिद करो न !,
इस मधुर बरसात में,
चुप रहो ना, कुछ कहो न !
इस मिलन की रात में.
मदहोश हैं ये फिजायें, चारों तरफ बेखुदी है,
डूबेंगे हम इस नशे में, ये मेरी दीवानगी है,
इस पहर में, दिल ही दिल में, अब डरो ना,
चुप रहो ना, कुछ कहो न !
इस मिलन की रात में.
सीने में एक आग है, बढ़ रही बेताबियाँ हैं,
साथ जब तुम हो मेरे, और ये तन्हाईयाँ हैं,
इस लहर में, हर सांस सांस में,तुम बंधो न,
चुप रहो ना, कुछ कहो न !
इस मिलन की रात में.
बिन तेरे ये मेरी आधी अधूरी सी ज़िन्दगी है,
तू ही मेरी बंदगी और तू ही तो मेरी ख़ुशी है.
वसले शब् में, बात बात पर, मुस्कुराओ न,
चुप रहो ना, कुछ कहो न !
इस मिलन की रात में.
रंग भरो न ! जिद करो न !
इस मधुर बरसात में,
चुप रहो ना, कुछ कहो न !
इस मिलन की रात में.

Ek Apeel

15 Aug

68 वें स्वतंत्रता दिवस के सुअवसर पर ‘एक अपील’

अपने मुल्क को खाना खराबी से रोकिये,
रोज़ हादसों पर भी हादसे होने से रोकिये.

अमीरी और गरीबी में पहले ही फासले हैं,
अब दिलों में बढती हुई दूरियों को रोकिये.

कीमतों पर अब कोई लगाम ही नहीं रहा,
इंसानियत को बे-मोल बिकने से रोकिये.

भ्रष्टाचारियों का बोल बाला है हर तरफ,
इंसान को ज़ालिम दरिंदा होने से रोकिये.

ये हिन्दू, मुस्लिम, सिख और इसाई बना,
तक्सीम आदमी को और होने से रोकिये.

मुजरिमों की नज़रें बस, कुर्सियों पर है,
सियासत का कत्लेआम होने से रोकिये.

सोने की चिड़िया लुटी,धर्म भाषाएँ लुटीं,
अब बेटियों की इज्ज़त लुटने से रोकिये.

झंडे के तीन रंग,सत्य अहिंसा खुशहाली,
हर कीमत पर झंडे को झुकने से रोकिये.

देश वासियों से करता है अपील “मिलन”
अटूट रिश्तों के तारों को टूटने से रोकिये

अपने मुल्क को खाना खराबी से रोकिये,
रोज़ हादसों पर भी हादसे होने से रोकिये.

Mukaddar Ki Baat

12 Aug

एक तेरे मुस्कुराने भर की बात थी,
मेरे लिए तो जीने मरने की बात थी.

नज़रें मिलीं और बस प्यार हो गया,
कहने कोतो यह बस ज़रा सी बात थी.

धडकनों ने दूर सेही पहचान लिया था,
बस तेरे नज़दीक तर आने की बात थी.

सामने मंजिल मेरे खुद ही आ गयी,
साथ तेरे एक कदम चलने की बात थी.

सारे शहर में जो एक आग फ़ैल गयी,
वो तेरे दिल में मेरे आने की बात थी.

इस जहाँ में कोई देखा नहीं तुम सा,
तू मिली ये मेरे मुक्कद्दर की बात थी.

मिलन ‘मोनी’

Chand Ki Chandni

7 Aug

चाँद की चांदनी, चाँद सी चांदनी,
चांदनी में नहाई हुई चांदनी,
चांदी चांदी सा तेरा चमकता बदन,
खेल पानी से करती हुई चांदनी.

चाँद की चांदनी, चाँद सी चांदनी,

रात रानी सी आँगन में ऐसी खिली,
हो सुगन्धित हवा भी कुछ ऐसे बही,
बात मेघों से करती रही चांदनी,

चाँद की चांदनी, चाँद सी चांदनी,

चाँद घूंघट की आड में ऐसे छुपा,
देखने जब उसे एक चकोर चला,
आँख मिचौली करती रही चांदनी,

चाँद की चांदनी, चाँद सी चांदनी,

समंदर की लहरों से पूछो ज़रा,
इतना बेचैन हो रहीं वो क्यों भला,
ज्वार भाटा कराती रही चांदनी,

चाँद की चांदनी, चाँद सी चांदनी,

चाँद धीरे से निकला तो ईद आ गयी,
चांदनी हर दिल में जवान हो गयी,
चाँद से बात करती रही चांदनी,

चाँद की चांदनी, चाँद सी चांदनी,

थोड़ी सिमटी हुई, थोड़ी मजलूम सी,
कुछ चटकी हुई, कुछ मगरूर सी,
दूध में नहाई हुई चांदनी,

चाँद की चांदनी, चाँद सी चांदनी,

अमावस् में चाँद कहीं छुप गया,
उन लम्हों में एक दीप जल गया,
दीवाली मनाती रही चांदनी,

चाँद की चांदनी, चाँद सी चांदनी,

Bheegapan

6 Aug

कमरों की हैं पलकें भीगीं,बेशक यहाँ कोई रोया है,
दीवारों पर टंगे हैं सपने,थक के यहाँ कोई सोया है.

उचट रहे हैं नाखून उस ही, फर्श के कि जिसपर,
रख कर पाँव ज़िन्दगी ने, गमों का बोझ ढोया है.

उतरे चेहरों की खुरचन, रूमालों पर लगी हुई है,
ठंडे पानी से जी भर कर, उदासियों को धोया है.

खून के छीटें बिस्तर पर, सिसक कर कह रहे हैं,
नफरतों के बीजों को, इस सीने में अपने बोया है.

रस्सियों पर फैले हैं रिश्ते, कड़ी धूप में सूखने को,
अपनों में ही अपनों को, अक्सर किसीने खोया है.

पलकें कमरों की हैं भीगीं,बेशक यहाँ कोई रोया है,
दीवारों पर टंगे हैं सपने,थक के यहाँ कोई सोया है.

मिलन ‘मोनी’

Hatheli Ki Lakeeren

3 Aug

किस बात का है ग़म और किसका गिला है,
मुश्किल में तुझे रब का सहारा भी मिला है

इन हाथों की मुठ्ठियों को ज़रा खोल के देखो,
हथेली की लकीरों में सभी कुछ तो लिखा है.

है भाग्य तुम्हारा बस इन्ही हाथों में तुम्हारे,
मेहनत की किताबों से पता इसका मिला है.

डूबे हैं जाने कितने ही सफीने इस भंवर में,
पर टूटी हुई कश्ती को किनारा भी मिला है.

मोहब्बत से बड़ी कोई भी दौलत नहीं होती,
उस तक तो पहुँचने का यही एक सिला है.

है सुबह ज़िन्दगी तो कभी है रात के साए,
जैसा मिले मौसम तो गुल वैसा खिला है.

हर इंसान से करता है वो इन्साफ बराबर,
जितनी बड़ी गलती हो फल उतना मिला है.

किस बात का है ग़म और किसका गिला है,
मुश्किल में तुझे रब का सहारा भी मिला है.

मिलन ‘मोनी’