Archive | February, 2015

Tum Kya Samjho…(yugal geet)

27 Feb
पुरूष

तुम जो भी हो…प्रिये मेरी हो,
जैसी भी हो…..प्रिये मेरी हो,

स्त्री

तुम जो भी हो…प्रिये मेरे  हो,
जैसी भी हो…….प्रिये मेरे हो,
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पुरूष
मेरे रोम रोम, मेरी सांस सांस में, रची बसी तेरी ही महक,
मेरी नींद नींद, मेरे स्वप्न स्वप्न में,तेरी छबि मनमोहक,
मेरी रूह रूह में, मेरी धड़कन की राग राग में,तेरी ही मूरत,
मेरी नज़र नज़र,मेरे गीत गीत, मेरे संगीत में,तेरी ही सूरत,
जितना प्यार, जितना दुलार, जितना अपना पन है तुझमे,
तुम जो सोचो, तुम जो समझो,

तुम जो भी हो…प्रिये मेरी हो,

जैसी भी हो…….प्रिये मेरी हो,
स्त्री
रूप सलोना, माथे की बिंदिया, चूडी की खन खन, सब तुझसे ही हैं,
आँखों का कजरा,जुल्फों का गजरा,पायल की छन छन,सब तुझसे हैं,
होंठों की लाली,हाथों की मेहँदी, पाँव की महावर की पहचान तुझसे है,
मेरे आँचल का मान सम्मान, मेरी मुस्कुराने का कारण भी तुमसे है,
कितना प्यार, कितना दुलार, कितना अपना पन है तुझमे,
तुम क्या सोचो, तुम क्या समझो,

तुम जो भी हो…प्रिये मेरे  हो,

जैसी भी हो…….प्रिये मेरे हो,
पुरूष और स्त्री
हम है साथ साथ, प्रिय जैसे यह धरती और आकाश,

एक नदी की धारा जैसे, कभी किनारा कभी मझधार,
एक ही उपवन में खिलते हों,बेला चमेली और गुलाब,
कभी हों गलियां सूनी सूनी कभी बरसती हों मुस्कान,

रब कितना प्यार,दुलार मिला है, एक दूजे का हमको,
कोई क्या जाने, कोई क्या समझे,
हम जो भी हैं….बस तेरे हैं,
जैसे भी हैं …….बस तेरे हैं.
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