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Ishtehaar

24 Jan

शहर के हर
नुक्कड़
हर चौराहे पर
दफ्तरों की दीवारों पर
सभी सार्वजनिक स्थानों पर
कोठियों पर
सरकारी इमारतों पर
बाज़ारों और स्कूलों पर
यह इश्तेहार लगवा देना
के आदमी यहाँ कहीं
गुम हो गया है,
हिन्दू बहुत हैं
मुसलमान बहुत हैं
सिख हैं काफी
ईसाई बहुत हैं
पर इंसान नहीं मिल रहा
और इसलिए किसी समस्या का
हल नहीं मिल रहा
खोज कर लाने वाले को
उचित इनाम मिलेगा,
ये मेरा वादा है !!

मिलन “मोनी”

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Aate Aate

19 Apr

फिर क्यों?
ठहर गयी ये धूप,
मेरे आँगन
आते आते !

सिमट गयी ज़िन्दगी,
घोर तिमिर में,
कोई बाती तक,
काम न आई,

फिर क्यों ?
ठहर गयी ये बात,
लबों तक
आते आते !

उतर गयी,
मुस्कान,
होंठों की,
कोई ठिठोली,
रास न आई,

फिर क्यों ?
बिखरे हालात,
मेरे बश में,
आते आते !

मन का पंछी,
उड़ा शितिज तक,
दर्द गहरा,
पाताल सतह तक,
कोई विधा,
कोई दवा,
काम न आई,

फिर क्यों ?
उखड गयीं साँसे,
बात लबों तक,
आते आते !

दर्द का उपहार,
लेकर,
नयना रोये,
सांझ,
सवेरे,
बाहें तक तेरी,
काम न आयीं

फिर क्या ?
सपने खोये,
आशाएं खोयीं,
उम्मीदों की
राहें खोयीं,
अपने घर तक,
आते आते !!