Kuchh Ka Kuchh

11 May

मदहोशी में नज़रे कुछ का कुछ समझती हैं
सारी दुनिया जाने कुछ का कुछ समझती है !

जुल्फें तेरी कुछ कहतीं हैं,
आँचल तेरा कुछ कहता है,
पर मोहब्ब्त जाने कुछ का कुछ समझती हैं !

समंदर हमसे कुछ कहता है,
किनारा हमसे कुछ कहता हैं,
पर लहर यह जाने कुछ का कुछ समझती हैं !

चाँद हमारा कुछ कहता है,
दिन सुनहरा कुछ कहता है,
पर रात अँधेरी जाने कुछ का कुछ समझती है !

तेरी पायल कुछ कहती है,
तेरा झुमका कुछ कहता है,
पर हाथों की मेहँदी कुछ का कुछ समझती हैं !

दिल की धड़कन कुछ कहती है,
रात मिलन की कुछ कहती है,
बागों की कलियाँ जाने कुछ का कुछ समझती हैं !

तू मुझसे कुछ कहती है,
मैं तुझसे कुछ कहता हूँ,
पर शंकित आँख जाने कुछ का कुछ समझती है !

रात बिरहा की कुछ कहती है,
सांस मिलन की कुछ कहती है,
पर बिस्तर की सिलवट कुछ का कुछ समझती है !

मदहोशी में नज़रे कुछ का कुछ समझती हैं
सारी दुनिया जाने कुछ का कुछ समझती है !!

मिलन “मोनी”

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