Dulare

12 Mar

तुम हमारे थे और हमारे ही न रहे
जिंदगी में वे सांझ सकारे ही न रहे

आया है जबसे आफताब फलक पर
चमकते हुए चाँद सितारे ही न रहे

खिले कहीं बेला कहींपे खिले गुलाब
बहारों के मगर वो इशारे ही न रहे

बारिषे आयीं कभी फुहारें भी आयीं
सावन के मगर वो नज़ारे ही न रहे

है ज़िन्दगी मझधार होकर रह गयी
धारा तो थीं मगर किनारे ही न रहे

बीच कमरे के कही चुनीं गयीं दीवारें
हाथ मिले मगर वो सहारे ही न रहे

रिश्तों की नज़र में ‘मिलन’तुम भी
अपने आपके भी वो दुलारे ही न रहे !!

मिलन “मोनी”

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2 Responses to “Dulare”

  1. Vaibhaw verma March 18, 2017 at 5:41 am #

    adbhut shilp hai, kaafi sahi likha aapne

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