Ghri Neend

29 Nov

गहरी नींद से कोई, यूँ ही तो नहीं जागा होगा !
उसका कोई सपना, टूट कर कहीं बिखरा होगा !!

छू छू कर निकल गयीं
साहिलों को कश्तियाँ,
गहरे कोहरे से ढक गईं
दिल अज़ीज़ घाटियाँ,
उम्मीदों से कोई नाउम्मीद
यूँ ही नहीं होता होगा,
उसका कोई अपना ही, उससे रूठ गया होगा !

समय की गर्द से ढका फर्श
परछाइयाँ कहाँ तक छुपा पायगा,
सूखे होंठों के भी गीले निशाँ
रुखसारों से कोई कैसे मिटा पाएगा,
उसके ख़्वाबों को ही कोई
मसल, कुचल गया होगा,
अजनबी भी कोई अपना सा, ऐसे तो नहीं लगता होगा !

पानी में कोई अक्स ढूंढती
लहरें तक चुप नहीं बैठेंगी,
साँसों तक महक ख्वाबों की,
कभी न कभी तो पहुंचेगी,
एक अंधा तूफ़ान भीतर तक,
सब उथल पुथल मचा गया होगा,
गीत पुराना भी कोई, मन न बहला पाया होगा !

बर्फीली हवाओं की तपन
कंपकंपा जायेगी सारा तन,
इन बाहों में अगर इस पल
समा जाएगा तू सजन,
आँसू कोई आँख से बस
यूँ ही नहीं फिसला होगा,
ख़याल उनका भीतर तक दिल दहला गया होगा !

गहरी नींद से कोई, यूँ ही तो नहीं जागा होगा !
उसका कोई सपना टूट कर कहीं बिखरा होगा !!

मिलन “मोनी”

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