Ajeeb Sham

25 Nov

अजीब शाम है यारों, दिल लगता नहीं है
लुट गया हूँ इतना के, कुछ बचता नहीं है

खराब है हाजमा मेरा, कुछ इलाज करिये
ग़म अब और ज़्यादा, मुझे पचता नहीं है

बस गए हैं आप बस, इस क़दर नज़रों में
आंखों को कोई नजारा,अब जंचता नहीं है

महकी है कली गुलाब, आज भी साँसों में
जिसके बगैर वक्त ये, अब ढलता नहीं है

फिर वही हैं मोंगरे के, फूल तेरी ज़ुल्फ़ में
जिसके बिना हुस्न तो, अब सजता नहीं है

तेरे चले जाने से यार, मन भीगा रहता है
सुकून का दीपक यहाँ, अब जलता नहीं है !!

मिलन “मोनी”

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