Khuda Ka Ishaara

30 Aug

उनसे मिलने का भी कोई इरादा न रहा,
दिल में रह कर भी वो आँख का तारा न रहा !

अब शिकायत करूँ मैं कहाँ औ किस से,
गर्दिशों में जो खुदा का भी इशारा न रहा !

हम लकीरों में तकदीर लिए फिरते हैं,
फिर भी तकदीर का कोई भरोसा न रहा !

एक वक़्त जब उनका ही ज़िक्र रहता था,
आज कल हुस्न का वही जलवा न रहां !

आयना टूट के शायद ये बिखर जाएगा,
अक्स भी हूँबहू इसमें हमारा न रहा !

जानें किस धार में बहती रही कश्ती मेरी,
दो किनारों में से कोई एक हमारा न रहा !

अपने अश्कों को ज़माने से छुपाऊं कैसे,
जेब में अपनी तो रूमाल हमारा न रहा !

दुश्मनों का तो ऐतबार नही था ‘मिलन’,
दोस्तों का भी अब कोई सहारा न रहा !

मिलन “मोनी”

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