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29 Aug

” कैसे कैसे लोग ”

नफरतें दिलों में ले के चलते हैं,
कैसे कैसे ये लोग मिलते हैं !

अब मुकम्मल बात नहीं होती,
लोग टुकड़ों में बात करते हैं !

खार रस्ते पे मत बिछाओ तुम,
नंगे पाँव हम उधर गुज़रते हैं !

आपकी आख से नशा कर के,
कितनी मुश्किल से हम सँभलते हैं !

रंग होंठों का लाल हो जाए,
जब दिलों में गुलाब खिलते है !

हुस्न तेरा कितना है बेमिसाल,
ये आयने भी खूब समझते हैं !

मुश्किलों से डर नहीं लगता,
फूल काँटों में भी खिलते हैं!

इन ग़मों का हिसाब क्या रखना,
ये तुम्हीं से ही तो मिलते हैं !

दिल्लगी हो गयी बहुत ‘मिलन’,
अच्छा अब हम भी घर निकलते हैं !

मिलन “मोनी”

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