Baithhe Baithhe

28 Aug

” बैठे बैठे ”

ख्वाब आँखों में हम सजा बैठे,
आपकी हाँ में ही हाँ मिला बैठे !

जलाए हमने रौशनी की खातिर
उन चरागों से ही घर जला बैठे !

तदबीर से कुछ गिला तो नहीं,
फिर भी तकदीर आजमा बैठे !

दर्द तो हो गए ज़ाहिर उन पर,
अश्क आँखों से हम गिरा बैठे !

बेखुदी में ये क्या कर दिया है,
उस बेबफा से ही कर बफा बैठे !

पत्थर दिल से कुछ नहीं हासिल,
कुछ कहो और कुछ बना बैठे !

नफरतों के इन मकानों में देखो,
छत अमन की हम बिछा बैठे !

कुछ शक और शिकायतों की खातिर,
दूरियां अपनों से ही बना बैठे !

पत्थरों के इस शहर में आज हम,
शीशे का आशियाना बना बैठे !

मेरी खामोशियों ने कहा कुछ नहीं और,
क्या क्या न जाने वो सुना बैठे !

गले से मुसीबत खुद लगा बैठे,
हिन्द और पाकिस्तां बना बैठे !

तमन्ना थी बस फूलों की’मिलन’,
बाग़ काँटों का हम लगा बैठे !!

मिलन “मोनी”

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