Vakif Hain

25 Aug

ज़िन्दगी हम तेरी मौजे कहर से वाकिफ हैं
दिल की कश्तियाँ लहर लहर से वाकिफ हैं

दिखाते हैं सब मगर कोई हमारा नहीं होता
हम दिलजलों की नज़र नज़र से वाकिफ हैं

सहर होने तक नहीं दिखेंगे उजाले कहीं पर
हम इन अन्धेरों के पहर पहर से वाकिफ हैं

जाने कौन सी बात कब लग न जाए मन को
आँखों से बहने वाली नहर नहर से वाकिफ हैं

वो मोहब्ब्त की किस गली से गुज़र सकते हैं
हम दिल के हर एक शहर शहर से वाकिफ हैं

नफरत किसी से भी करते नहीं’मिलन’जबकि
हम इंसानों में पलते जहर जहर से वाकिफ हैं

मिलन “मोनी”

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2 Responses to “Vakif Hain”

  1. Astha gangwar poetries blog August 25, 2016 at 8:29 am #

    Nice creation

  2. milanbhatnagar August 30, 2016 at 4:43 am #

    शुक्रिया आस्था

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