Ban Ke Dekh

18 Aug

कभी तो दिल के आसमां पे चाँद बन के देख
वसले शब् में मेरे लबों की प्यास बन के देख

देती है सुकूंन कितना यह कशिश मुहब्बत की
पुरानी इश्क की कोई ज़रा शराब बन के देख

सारी नेमतें एक ओर पर वो लम्हे इक तरफ
सुबह सुबह की आँखों की तू नींद बन के देख

दिन में देखे ख्वाब तो दिन में ही टूट जायेंगे
चमकते कहाँ जुगनू कभी तू रात बन के देख

तेरे आने से अब कहाँ कहाँ हो जाती है रौशनी
मेरे घर के आगन में तू आफताब बन के देख

मज़ा है डूबने का कुछ और ही इसमें “मिलन”
झील की गहराइयों सी एक शाम बन के देख

मिलन “मोनी”

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2 Responses to “Ban Ke Dekh”

  1. Astha gangwar poetries blog August 19, 2016 at 4:07 am #

    Well written poem

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