Shabe-Hayaat

10 Jul

न गुल खिले न गुलशन सजे न बहार आई है
कितनी वीरानियाँ लेकर ये शबे-वस्ल आई है

न साज़ उठे न राग बनी न गज़ल कह पाई है
कितनी तन्हाइयाँ लेकर ये शबे-जश्न आई है

न महफिलें सजी न जाम उड़े न होश गवाएं हैं
कितनी खामोशियाँ लेकर ये शबे-बज़्म आई है

न बादल छाये न बिजली चमकी न पानी बरसा
कितनी आराइशों के साथ ये शबे-अश्क आई है

न चाँद निकला न तारे बिखरे न सर्द हवा चली
कितनी रानाइयों के साथ ये शबे-बारात आई है

न ताल न सरोवर न नदी न झरना और न मेघ
गज़ब की प्यास लेकर आज शबे-हयात आई है

न नींद आयी न करार आया न याद आयी तेरी
कितनी बेक़रारियाँ लेकर ये शबे-इंतज़ार आई है

न वादा किया न मुकर्र वक़्त न चाहते “मिलन”
कितनी आश्नाइयाँ साथ लेके शबे-मीराज़ आई है

मिलन “मोनी”

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: