Nikal Raha Tha Mai

12 Dec

जहाँ सूरज जैसा निकल रहा था मैं 
वहीँ शाम होते होते ढल रहा था मैं 
 
यह कैसा आसमान था मेरा नसीब
बादलों सा बेसबब बरस रहा था मैं
 
किस मंजिल ले जा रहा था मुझको  
इतनी भीड़ में तन्हा चल रहा था मैं
इस उजाले में कौन मुसाफिर ठहरे
एक दीप सा अकेला जल रहा था मैं
 
दरिया के बहाव से आगे तेज़ी तेज़ी   
कश्ती में पतवार सा चल रहा था मैं 
 
किनारों से ये दोस्ती रही नहीं कभी
मझधार में ज़र्रा ज़र्रा बह रहा था मैं 
 
मेरे होने की मुझको ही खबर नहीं है  
राज़ जैसा सीने में ही पल रहा था मैं 
 
इंसान ही इंसान के काम नहीं आता 
अपनी बिरादरी को ही खल रहा था मैं 
 
वक़्त किसका बदल जाए पता नहीं है 
कही धूप कही छाव सा चल रहा था में 
 
खुद अपने आपको बराबर छलता रहा 
पतझड़ में इतना फूल फल रहा था मैं 
 
घबराया नहीं मुश्किल घडी से मिलन   
सारी मुसीबतों का खुद हल रहा था मैं
‘मिलन’   १२/१२/२०१५
 
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