Sitamgar

8 Nov

खुदा तूने सितमगर बनाया न होता
रब की कसम दिल गवाया न होता

गवाया न होता दिल प्यार में हमने
हुस्नवालों ने इतना जलाया न होता

धुंधला सा रहेगा अक्स इतना तेरा
आईनों में तुमको सजाया न होता

गलती अपनी कबूल करली होती गर
तो सरे आम इतना तमाशा न होता

जो आँखों आँखों में समा जाते तुम
रात भर ख्वाबों ने जगाया न होता

हवा उड़ा ले जाती बादलों को कहीं
बारिषों ने जी भर रुलाया न होता

ये मिलेगा न वो पता होता मिलन
उम्मीदों को इतना बढाया न होता

खुदा तूने सितमगर बनाया न होता
रब की कसम दिल गवाया न होता

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2 Responses to “Sitamgar”

  1. themohit February 15, 2016 at 4:52 pm #

    Awesome poem!

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