Maharbani Shukriya

29 Sep

इस महरबानी शुक्रिया की अब क्या ज़रुरत है,
यहाँ दिल के बदले दिल ही देने की रवायत है,

मेरे दिल का हाल सारी दुनिया को मालुम है,
पर आपकी आँखों में कुछ आखिर शरारत है,

मेरी ज़िन्दगी को यूँ कज़ा की क्या ज़रुरत है,
जब मुस्कराहट आपकी खुद एक क़यामत है.

सच कहूँ तो हुस्न तेरा बला का खूबसूरत है,
नज़रों को मेरी तो आपसे इसकी शिकायत है

जी रहा है आपके रहम-ओ-करम पे ‘मिलन’
मेरी ज़िन्दगी तो आपकी नज़र-ऐ-इनायत है.

इस महरबानी शुक्रिया की अब क्या ज़रुरत है,
यहाँ दिल के बदले दिल ही देने की रवायत है!

मिलन ‘मोनी’

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