Maza Kuchh Aur Hota Hai

21 Aug

वो महफिल मे हों तो महफिल का मज़ा ही,कुछ और होता है,
बात नज़र से हो तो उन बातों का असर ही,कुछ और होता है,

हया से शर्मा करके झुका लेते हैं वो नज़रों को जिस अदा से,
तसलीम-ऐ-मोहब्ब्त का ऐसा नजरिया ही,कुछ और होता है,

शब्-ऐ-वस्ल भी उनकी औ यह शब्-ऐ-इंतज़ार भी उनका,
ऐसी फुरक़त में पल पल का गुजारना ही कुछ और होता है,

प्यास होंठो पर हो मेरे, औ पैमाना उनकी आँखों में छलके,
साकी ऐसे मयखाने पे जाने का नशा ही, कुछ और होता है.

यूँ तो हर आग में जलने का अपना अलग लुत्फ़ है शायद,
आतिश-ऐ-मोहब्ब्त में सुलगने का मज़ा, कुछ और होता है.

गुलों में रंग भरा हो और गुलाबों जैसी वह बदन की खुशबू,
ऐसे में नई ग़ज़ल गुनगुनाने का मज़ा ही,कुछ और होता है.

वो महफिल मे हों तो महफिल का मज़ा ही,कुछ और होता है,
बात नज़र से हो तो उन बातों का असर ही,कुछ और होता है,

“मिलन”

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