Mera Kya ?

29 Jul

मेरा क्या ?

दर्द,
मेरे साथ ही पला,
एक ही पालने में झूला झूले,
एक ही बिस्तर पर सोए,
एक साथ खेले,
कई खिलौनों को तोडा,
साथ रोये,
साथ हँसे,
साथ साथ बड़े हुए,
अब तक साथ हैं.

एक बार मैं,
आम के पेड़ पर चढ़ गया,
आम तोड़े,
आम खाए,
कुछ मीठे,
कुछ खट्टे,
माली के डंडे की आवाज़ सुनी,
डर कर,
कूद पड़े,
पैर की हड्डी तुडवाई,
कोई नहीं आया,
वो ही मुझे,
किसी तरह,
घिसता घिसता कर,
घर तक ले कर आया,
अहसान तक नहीं माना,

वो चुलबुला था,
मैं शरारती,
खूब लुक्का छुप्पी खेलते थे,
मैं जहाँ भी छुपता,
वो खोज लेता था,
वो हरदम जीत जाता था,
मैं हारता ही था,
फिर रोता भी था,
वो ही मेरे आँसू,
पोछ देता था,
हौसला देता,
अगली बार जीत का,
आश्वासन देता,
सो मैंने हर परीक्षा उत्तीर्ण की,
बस हारा तो उसही से हारा,

एक बार,
जब मैं बीमार पड़ा,
वो मेरे सिरहाने बैठा रहा,
ठंडी पट्टियाँ रखता रहा,
मैं कहराना चाहता था,
मगर घुट गयी आवाज़,
कौन सुनता,
इस वक़्त,
मेरे जज़्बात,
सभी तो गहरी नींद में होंगे,
बस वो जागता रहा,
जब तक मैं,
सोया नहीं.

मेरी नाकाम मोहब्ब्त के चर्चे,
सारे शहर में थे,
मेरा मन,
ज़िन्दगी से,
उचाट रहने लगा,
मरना तक चाहा,
मगर उसने ही रोक दिया,
और मुझपर,
नज़र रखने लगा,
शायद उसे,
मेरे इरादों पर शक था,
इसके बाद,
वह कभी,
दूर नहीं गया,
और,
मेरे कमरे में ही,
रहने आ गया,

बचपन से जवानी,
जवानी से बुढ़ापा,
इतना ही सफ़र था मेरा,
लेकिन वो,
हमेशा की तरह,
चंचल,
चपल,
चुलबुला,
और जवान था,
न चेहरे पर झुर्रियां,
न आवाज़ में झुनझुनाहट,
न कभी कोई रोग,
पता नहीं,
किस मिटटी का बना है,
न मौसम का असर,
न वक़्त की मार,
न समय की पाबंदी,
कितना बिंदास है वो,

कई घर हैं उसके,
वह जहाँ जी चाहे,
रह सकता है,
सब जानते हैं उसे,
पर कोई पहचानता नहीं,
उसका चेहरा,
कोई देख नहीं सका आज तक,
एक मैं ही था,
जो उसे बहुत करीब से जानता था,
पहचानता था,
शायद,
अचानक किसी रोज़,
आयने में देख लिया था,
आकस्मात.

एक बार जब,
बेतहाशा,
बारिश हुई थी,
टूट पड़ा था आकाश,
मेरे घर की,
ईंट ईंट बिखर गयी थीं,
सारे अपने,
छोड़ गए थे साथ,
तब,
उसने ही,
मुझे बिखरने से बचाया था,
एक एक ईंट ,
जोड़ जोड़ कर,
मेरा घर बनाया था,
और मुझे,
नए सिरे से दोबारा,
बसाया था,
नहीं तो शायद,
हम बह गए होते,
आसुओं की तरह.

कभी कभी,
वह दबे पाँव,
मेरे पीछे आ जाता,
और मेरी आँखों पे हाथ रख,
पूछता,
बूझो मैं कौन हूँ,
नटखट कहीं का,
मैं,
उसकी साँसों की आवाज़ से,
पहचान लेता था,
फिरभी,
अंजान बना रहता था,
जान बूझ कर हार जाता था,
आखिर,
उसे जीतने की आदत जो थी,
मेरा क्या,
मेरा क्या?

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One Response to “Mera Kya ?”

  1. themohit July 30, 2015 at 2:16 pm #

    This is a dark one. I like it though!

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