Meharbaani Karta hun

29 Jul

मैं आज भी उन पर महरबानी करता हूँ,
मैं अपने गमो से पूरी बफादारी करता हूँ,

लहजा मेरा आज भी बदला नहीं है ज़रा,
बिंदास अपने आपसे अदाकारी करता हूँ,

निकल गए बहुत आगे इस ज़िन्दगी में,
मैं जिन ज़ख्मों से इमानदारी करता हूँ,

चुभें जब फूल तो काँटों से क्या उम्मीद,
मैं दोनों की ख़ुशी से तीमारदारी करता हूँ,

कोई मेरे नज़दीक आए तो समझे शायद,
मैं किस तरह दर्द की तर्ज़ुबानी करता हूँ,

मैं आज भी उन पर महरबानी करता हूँ,
मैं अपने गमो से पूरी बफादारी करता हूँ,

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