Chaha Tha Jo Bhi Humne

29 Jul

चाहा था जो भी हमने,
कुछ भी तो कह न पाए,
अपनी तन्हाइयों से बातें,
एक पल भी कर न पाए,

अक्स परछाइयों के ये,
दर्पण समझ न पाए,
तुझसे मिलने मेरे रास्ते,
कुछ ख्वाब आ न पाए,
तेरे अधरों से मेल खाए,
वो गुलाब खिल न पाए.
……….चाहा था जो भी हमने,
……….कुछ भी तो कह न पाए,

मेरी तेरी मुहब्बत की,
हम किताब पढ़ न पाए,
पीने की लत थी फिरभी,
सब आँसू हम पी न पाए,
वह सैलाब था के जिसमें,
मेरे ग़म भी बह न पाए.
……….चाहा था जो भी हमने,
……….कुछ भी तो कह न पाए,

तब तेरे शहर में आकर,
एक ग़ज़ल लिखी थी मैंने,
वह आज भी है दिल में,
और तुझे सुना न पाए,
लहरों की बेचैनियों को,
ये समंदर समझ न पाए,
……….चाहा था जो भी हमने,
……….कुछ भी तो कह न पाए,

मंजिलें हैं दूर कितनी,
राहगीर समझ न पाए,
नीले आसमां से आगे,
कोई पंछी उड़ न पाए,
कुछ गहराइयाँ ह्रदय की,
कोई व्यथा लगा न पाए,
……….चाहा था जो भी हमने,
……….कुछ भी तो कह न पाए,

कसमें खायीं थीं मैनें,
वो सब निभा न पाए,
लम्हे सुकूं के कुछ भी,
हम भी बिता न पाए,
लिखना था ख़त तो लम्बा,
दो शब्द भी लिख न पाए,
……….चाह था जो भी हमने,
……….कुछ भी तो कह न पाए,

तेरे प्यार में था हमें मरना,
पर मर के भी मर न पाए,
तेरी यादों में मुझे था जीना,
पर जी कर भी जी न पाए.
जाना था दूर हमको,
दो पग भी चल न पाए,
……….चाहा था जो भी हमने,
……….कुछ भी तो कह न पाए,

चाहा था जो भी हमने,
कुछ भी तो कह न पाए,
अपनी तन्हाइयों से बातें,
एक पल भी कर न पाए.

“मिलन” १९/६/२०१५

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