Aankhon Ka Samander

16 Mar

आँखों का समंदर 

आँखों का ये समुंदर छलक क्यों नहीं जाता,

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.

कुछ पल तो हमभी अपने, सुकून से गुज़ार लेते,

बाहों में उनकी, अपनी कुछ तो रातें सवार लेते,

तूफ़ान यह दिलों का, ठहर क्यों नहीं जाता,

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.(१)

हर बात क्या जुबान से भी, कहना है अब ज़रूरी,

समझेगा कब ज़माना इस प्यार की यह मजबूरी,

आँखों से बात दिल की समझ क्यों नहीं जाता,

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.(२)

छाये हैं हर तरफ ही, तन्हाइयों के बादल,

प्यासे दिलों को और करने लगे हैं पागल,

झोंका कोई हवा का, इधर क्यों नहीं आता,

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.(३)

इतने करीब हैं मगर फिर भी कुछ दूरियां,

बज रहीं है हर तरफ प्यार की शहनाइयाँ,

पत्थर यह रास्ते का पिघल क्यों नहीं जाता.

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.(४)

आँखों का ये समुंदर छलक क्यों नहीं जाता,

कुछ दर्द मेरे दिल से निकल क्यों नहीं जाता.

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4 Responses to “Aankhon Ka Samander”

  1. Uma mausi. April 17, 2013 at 5:01 am #

    Moni hello,
    I knew you write poetry,but this is beautiful.

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