Pyar Ki Dor

30 Oct

प्यार की डोर 

कभी ये प्यार की डोर अपनी टूट ना जाये कहीं,

सुबह की ये धूप आंगन से निकल ना जाये कही.

माना सुकून मिलता है इश्क मे मर जाने से भी,

बेवजह जिंदगी मे कुछ का कुछ हो ना जाये कही.

     नजदीकियां भी रुला देती हैं रिश्तों को कभीं कभी,

मुस्कुराते हुए आंख से आंसू छलक ना जाएँ कहीं.

मै तो हूं एक पथिक कुछ देर ठहर कर चल दूंगा

बात अब दिल की दिल ही मे रह ना जाये कही,

जो भी कहना है कह लो इस ही वक़्त ‘मिलन’

देखते देखते ये उम्र प्यासी गुज़र ना जाये कही.

कभी ये प्यार की डोर अपनी टूट ना जाये कहीं ,

सुबह की ये धूप आंगन से निकल ना जाये कही,

उनकी बाहों मे ही मेरा दम निकल ना जाय कही

————————–

 

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3 Responses to “Pyar Ki Dor”

  1. sakshivashist November 1, 2012 at 1:54 pm #

    Hi there,
    I have nominated you for “One Lovely Blog Award”.
    Check it out :
    http://sakshivashist.wordpress.com/2012/11/01/appreciate-the-appreciation-a-k-a-one-lovely-blog-award/

    Congratulations!

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