Woh Darpan

10 Oct

वह दर्पण

वह दर्पण अब,

धुंधला धुंधला सा,

लगने लगा है,

जिसकी चमक,

एक रौशनी की तरह,

चमकीली और साफ़ थी .१.

अब दिल की दीवारों से,

चिपक गया है,

सन्नाटा,

और,

एक तूफ़ान सा,

उठा रहा है,

मन के अंदर यूँही,

जैसे,

करहा रहा है कोई,

सपना सा कहीं यूँही.२.

कब मेरी किताब मे ही,

रखा रखा सूख गया,

वह गुलाब,

किसीकी याद मे जो,

संजोया था,

मुद्दतों से.३.

दिल की मिटटी पर ही,

कुछ पत्थर उग आये है,

नुकीले, नुकीले,

जिनकी,चुभन से,

बच बच कर निकल रहे हैं,

एहसास और,

जज़्बात मेरे.४.

आज हवा,

सूखे पत्ते समेट कर,

गुज़र गयी,

इस ही तरफ से,

और दर्द,

आँखों से बाहर आकर,

बैठ गया पलकों पर,

एक ओस की बूँद जैसे,

जम गयी आँखों पर

याद बन कर.५.

कब अनायास,

रेत की तरह,

मेरी मुठ्ठी से,

वक्त,

निकल गया,

और उसी दर्पण पर थक कर,

सो गया,

जिसकी चमक,

एक रौशनी की तरह,

चमकीली और साफ़ है.६.

वही दर्पण.//

—————————————

10/9/2012

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2 Responses to “Woh Darpan”

  1. Momo October 10, 2012 at 1:53 am #

    Wah wah, kya baat hai

    • milanbhatnagar October 10, 2012 at 4:23 am #

      Thanks dear

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